आख़िर कहाँ गायब हो जा रही झारखंड की बेटियां?

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झारखंड सरकार के पास अभी तक इस बात का कोई प्रमाणिक आंकड़ा नही है कि झारखंड से कितनी लड़कियां और युवतियां मानव तस्करी का शिकार हो चुकी हैं।

एक प्राइवेट संस्था की सर्वे के अनुसार झारखंड से अब तक करीब 42 हज़ार युवतियां मानव तस्करी का शिकार हो चुकी हैं। यह कोई छोटा मोटा आंकड़ा नही है जिसे सरकार नज़रअंदाज करती रही है। हालांकि सरकार अभी पहली बार झारखंड से हुए असुरक्षित पलायन का अध्यन करा रही है। जिसका रिपोर्ट आगामी कुछ महीने में आ जाएगा।

सामने आए हैं होस उड़ा देने वाले आंकड़े

सर्वे के अनुसार लगभग 4 साल पहले दुमका, गोड्डा, हजारीबाग, गुमला, लोहरदगा, रांची, पाकुड़ और सिमडेगा के कई गांवों से 785 युवतियां मानव तस्करी का शिकार हुई हैं। जिसमें 160 युवतियों के इंतज़ार में आज भी उनके परिजन आंखे बिछाए हुए हैं।

शेष बचे युवतियों में कुछ तो लगातार अपने परिवार के सम्पर्क में रहीं, कुछ कभी कभार बात करती तो कुछ से कई महीनों में 1 बार सम्पर्क हो पाता था।

UP में बिक रही थी झारखंड की बेटी

अभी हाल में ही झारखंड से एक किशोरी को बेचने के मकसद से बुलंदशहर ले गई महिला सहित 7 लोगों को अहमदगढ़ पुलिस ने धर दबोचा। साथ ही किशोरी को भी अपने कब्जे में ले लिया है।

खबरों के अनुसार अहमदगढ़ थाना के सब इंस्पेक्टर रामगोपाल पेट्रोलिंग ड्यूटी पर थे इसी दौरान एक मुखबिर ने उन्हें सूचना दी कि झारखंड निवासी कलावती अपने साथ एक किशोरी को लेकर नौरंगाबाद आई हुई है जो कि सावित्री के घर में ठहरी हुई है और किशोरी को बेचने के प्रयास में लगी हुई है। खबर मिलते ही अहमदगढ़ पुलिस की टीम ने मुखबिर द्वारा बताए गए घर में छापामारी की और कलावती सहित 7 लोगों को धर दबोचा। साथ ही 16 वर्षीय किशोरी को भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया।

आगे दैनिक अखबार जागरण में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार कुछ घटनाओं का जिक्र है।

एक कमरे में कैद थीं झारखंड की 25 बच्चियां

दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी व पंजाबी बाग में झारखंड की 25 बच्चियों को कैद कर रखे जाने की पुख्ता खबर मानव तस्करी के विरुद्ध अभियान छेडऩे वाली संस्था बीकेएस को थी। उन्हें मुक्त कराया जाना था। सबकुछ नाटकीय अंदाज में होना था। बीकेएस की टीम वहां दलाल बनकर पहुंची और मानव तस्करों को अपने जाल में फांसने में सफल रही। सामने ही छोटा सा कमरा था, जहां लड़कियों के होने की पुख्ता खबर बीकेएस को थी। मौका देखकर बीकेए के निदेशक अचानक उस कमरे की ओर बढ़े। उन्होंने दरवाजे पर जोर का धक्का दिया।

कमरे में बंद बच्चियां चिल्ला उठीं। एक तस्कर ने उन पर शराब की बोतल से निशाना साधा। उससे पहले की कुछ अनहोनी होती पहले से ही अलर्ट दिल्ली पुलिस ने सभी को गिरफ्तार कर लिया। बच्चियों को मानव तस्करों से मुक्त कराने का बीकेएस का यह पहला सफल अभियान था। उस समय सफदरजंग में झारखंड भवन हुआ करता था, बच्चियों को वहां रखा गया। यह महज संयोग ही था कि मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा तब दिल्ली में ही थे। मानव तस्करी के इस विद्रूप चेहरे को देखकर उन्होंने तत्काल ट्रांजिट होम की घोषणा कर डाली। हेल्पलाइन नंबर भी जारी करवाया। यह अभियान पूरे देश के अखबारों की तब सुर्खियां बना था।

फ्लैट में बंदकर 15 दिनों के सैर-सपाटे पर थाइलैंड चले गए थे डॉक्‍टर दंपती

द्वारका सेक्टर- 6 स्थित हरमैन अपार्टमेंट गायत्री (बदला हुआ नाम) तब 13 साल की थी। दलालों के बहकावे में आकर वह 2011 में दिल्ली पहुंच गई। दलालों ने उसे दिल्ली के द्वारका सेक्टर- 6 स्थित हरमैन अपार्टमेंट में रहने वाले एक डॉक्टर दंपती के हाथों बेच डाला। वह वहां बतौर नौकरानी काम करने लगी। 25 मार्च 2012 को डॉक्टर दंपती गंगोत्री को फ्लैट में बंदकर 15 दिनों के सैर-सपाटे पर थाइलैंड चले गए थे।

गायत्री ने घर के बचे हुए खाने पर दो-तीन किसी तरह गुजारा किया। जब भूख बर्दाश्त नहीं हुई, मदद के लिए खिड़की से चिल्लाने लगी। अग्निशमन की टीम की सहायता से 29 मार्च 2012 को उसे कोठी से बाहर निकाला गया। तब गायत्री के शरीर पर घाव के कई निशान पाए गए थे, जो डॉक्टर दंपती की ही देन थी। उसे दिल्ली स्थित निर्मल छाया होम में रखा गया। गायत्री हिंदी नहीं समझती थी, लिहाजा नागपुरी भाषा में उसकी काउंसलिंग की गई। सारी कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद गायत्री को झारखंड लाया गया। इधर, थाईलैंड से लौटते ही डॉक्टर दंपती को गिरफ्तार कर लिया गया