जमुआ गांव में कैंसर से पीड़ित महिला की हुई मौत।

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संवाददाता- विवेक चौबे

गढ़वा : जिले के कांडी थाना क्षेत्र अंतर्गत बलियारी पंचायत के जमुआ गांव में कैंसर से पीड़ित- फुदन चंद्रवंशी की इलाज के अभाव में हुई मौत। तमाम सरकारी योजनाओं का भी नहीं मिला लाभ, ग्रामीणों से चंदा कर एक साल से करा रहा था इलाज।वहीं असाध्य रोगों के इलाज के लिए चल रही तमाम योजनाओं के बाद भी आखिरकर इलाज के अभाव में महापर्व होली के दिन शाम 4 बजे चालीस वर्षीय कैंसर पीड़ित ने दम तोड़ दिया। इलाज के अभाव में तकरीबन तीन माह से तड़पता रहा। लेकिन सरकारी स्तर पर कोई व्यवस्था नहीं हो सकी। सरकार के तमाम दावे जिस तरह धरातल पर आते-आते दम तोड़ देते हैं। उसी तरह बलियारी पंचायत अंतर्गत जमुआ गांव के चालीस वर्षीय अत्यंत गरीब युवक ने दम तोड़ दिया। यही नहीं मौत होने के बाद घर में कफन के अभाव में शव तकरीबन चार घंटे तक पड़ा रहा। मानवता शर्मसार होने लगी तो प्रमुख प्रतिनिधि सह झामुमो युवा नेता सत्येंद्र पांडे उर्फ पिंकू पांडे समेत कई अन्य जिम्मेवारों की नींद खुली और आर्थिक सहायता के बाद शव का दाह संस्कार के लिए ले जाया गया। कैंसर पीड़ित की मौत के बाद तो उसकी कहानी समाप्त हो गई लेकिन अब उसके परिजनों के समक्ष अन्न के दाने के लाले पड़े हैं। पिछले कई माह से जिम्मेदारों से गुहार लगाते हुए मदद मांगकर इलाज करा रहा था। ग्रामीण व उनके परिजनों ने किसी तरह कुछ माह तक कैंसर पीड़ित के परिवारवालों को खिलाया लेकिन अब पीड़ित की मौत के बाद उसकी विधवा पत्नी एवं तीन अबोध बच्चे की परवरिश पर भी संकट आ खड़ा हुआ है। कैंसर पीड़ित युवक के गंभीर अवस्था में गांव के लोगों ने चंदाकर इलाज कराया उसके परिवार व बच्चों को भोजन दिया। युवक ही घर का एक मात्र सहारा था जो मजदूरी कर परिवार का पालन पोषण करता था। ग्रामीण भी चिंतित हैं कि आखिर कब तक मुहल्ले वालों के रहमो करम पर परिवार की परवरिश होगी।

तकरीबन तीन माह पूर्व से बिगड़ने लगी हालत

अत्यंत गरीब फुदन चन्द्रवंशी एक साल से कैंसर से पीड़ित था। माली हालत खराब रहने से इलाज नहीं करा पा रहा था। हालत जब ज्यादा बिगड़ने लगी तो तीन माह पूर्व से मुहल्ले के लाेग चंदा कर किसी तरह इलाज करा रहे थे। पीड़ित कई लोगों से लगा चुका था गुहार, कुछ दिन गढ़वा समेत कई अन्य जगहों पर इलाज हुआ उसके बाद रांची रिम्स से इलाज चल रहा था। जनप्रतिनिधियों से परिजनाें ने गुहार लगाई लेकिन किसी ने नहीं सुनी। पीड़ित युवक के पास इतनी समझ व समर्थ नहीं थी कि प्रशासन तक अपनी बात पहुंचा पाता। प्रशासन के लोग यदि समय पर संज्ञान ले लेते तो शायद उसकी जान बच जाती। काफी दिनों तक स्थानीय स्तर पर ही मदद मिलती रही।