झारखंड की स्वर्णपरी टोक्यो ओलंपिक उतरने को तैयार

0

झारखंड -विपरीत परिस्थितियां, आलोचकों की जुबान पर चढ़ना और बिना पदक के देश वापसी। पिछले एक दशक से झारखंड की स्वर्णपरी दीपिका कुमारी इन सभी परिस्थितियों से गुजरी है। जब जुलाई में टोक्यो में वह निशाना साधेगी तो यह तीसरी मर्तबा होगा, जब किसी ओलंपिक में भाग लेंगी। वह सवा अरब भारतीयों की उम्मीदों का पहाड़ लेकर मैदान पर उतरेगी। ग्वाटेमाला में तीरंदाजी विश्वकप स्टेज-1 में व्यक्तिगत स्वर्ण जीत उसने फिर भारतीयों की उम्मीदों को जिंदा कर दिया है। दीपिका कुमारी ग्वाटेमाला में रिकर्व व्यक्तिगत तीरंदाजी के दौरान लगातार तीन दिनों तक मानसिक दवाब में रही। लेकिन यही उनकी खासियत है। दबाव में बेहतर करने की। हर बार शॉट लगाने के बाद कोच पूर्णिमा महतो की ओर घूमती है। कोच का जवाब होता है, ””बढ़िया।”” इस शब्द के साथ ही उनका हर तनाव दूर हो जाता है। उनसे हर बार पदक की उम्मीद की जाती है। हर बार उनसे ओलंपिक स्वर्ण हासिल करने से संबंधित सवाल पूछे जाते हैं। दीपिका अपने कंधों पर इन्हीं मानसिक तनाव को लेकर जीती है।

पूर्व भारतीय तीरंदाज डोला बनर्जी कहती है, दीपिका अनुभवी है। इसी कारण उनमें विश्वास कूट-कूट कर भरा है। वह हमेशा अपनी गलतियों को सुधारती रहती है। चाहे वह तकनीक हो या फिर मनोवैज्ञानिक स्तर पर। देखकर यह अच्छा लगता है। वह टीम कैप्टन की तरह प्रदर्शन करती है और आगे बढ़कर नेतृत्व भी करती है। दीपिका कहती हैं, लंबे वक्त के बाद मुझे किसी बड़ी प्रतियोगिता के फाइनल में शूटिंग करने का मौका मिला। यह अच्छा अनुभव है। इस स्वर्ण पदक से विश्वास बढ़ा है और मुझे बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित भी करता है। दीपिका ऐसे ही दबाव के साथ जीना सीख चुकी है। इतने कम उम्र में अर्जुन पुरस्कार व पद्मश्री जैसा सम्मान पा चुकी यह स्वर्णपरी ने पिछले लॉकडाउन के दौरान कहा था, मैच के दौरान कैसे बेहतर प्रदर्शन करना है, इसे मैं बखूबी जानती हूं। सोशल मीडिया पर भले ही मेरे प्रतिद्वंद्वी तीरंदाज अभ्यास का वीडियो बनाकर डालते रहे, लेकिन मैच में मेरा प्रदर्शन ही बेहतर होगा।