बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची में आयोजित ‘बाढ़ और जलाशय अवसादन को रोकने के लिए भूदृश्य प्रबंधन का किया गया आयोजन

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राँची:-बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की मेजबानी में देश में बाढ़ और जलाशय अवसादन को रोकने के लिए भूदृश्य प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मलेन के आयोजन पर मुझे बहुत हर्ष है।

भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संघ, देहरादून, उत्तराखंड, महात्मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, बिहार और बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हो रहे यह सम्मलेन राष्ट्रहित में एक बहुत अच्छी पहल है, मैं आयोजकों को इसके लिए बधाई व शुभकामनाएं देता हूँ।

कृषि, भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है एवं आजीविका का प्रमुख स्रोत भी है। भारत को गांवों का देश कहा जाता है और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश लोग कृषि कार्य में लगे हुए हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने “भारत को गांवों का देश और कृषि को भारत की आत्मा कहा है।“ आज भारत वैश्विक स्तर पर भारत कृषि उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी देशों में शामिल है।

हमारा देश कृषि के क्षेत्र में न केवल आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है, बल्कि खाद्यान्न की अपनी जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ अन्य देशों को भी उपलब्ध कराने की दिशा में भी प्रयासरत हैं। भारतीय कृषि व कृषक कैसे आत्मनिर्भर बने, इसके लिए आप सभी कृषि वैज्ञानिकों को गंभीरता से सोचना होगा और फिर सक्रियता से कार्य करना होगा।

आप लोगों को किसानों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुनना और समझना होगा। हमारे किसानों को मालूम होना चाहिए कि उनका खेत किस फसल उत्पादन के लिए बेहतर व अनुकूल है, किसानों को उनके खेतों की मिट्टी की जाँच के लिए प्रेरित करना होगा। उन्हें बागवानी के लिए भी प्रेरित करने की जरूरत है। कृषि वैज्ञानिकों को उन्नत बीजों का आविष्कार कर उन्हें खेतों तक एवं नई तकनीक विकसित कर उन्हें किसानों तक पहुंचाने का कार्य करने की दिशा में भी सोचना होगा।

भारत में कृषि मुख्यतः मौसम पर आधारित है और जलवायु परिवर्तन की वज़ह से होने वाले मौसमी बदलावों का कृषि पर बेहद असर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन से हर क्षेत्र प्रभावित होता है, लेकिन दुर्भाग्यवश किसान के इसकी चपेट में आने की संभावना सबसे अधिक रहती है।

जलवायु परिवर्तन के कारण हुई तापमान में वृद्धि होने से सूखा आने से, बाढ़ एवं अन्य घटनाओं जैसे- भूस्खलन, भारी वर्षा, ओलावृष्टि और बादल फटने आदि से भी भारत में कृषि क्षेत्र एवं जनजीवन प्रभावित हो रहा है। भारत उन देशों में शामिल है, जिसे जलवायु परिवर्तन से आर्थिक रूप से बहुत ज्यादा नुकसान का सामना करना पड़ता है।

वैश्विक स्तर पर बांग्लादेश के बाद भारत दुनिया का सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित देश है। बाढ़ हमारे देश के लिए एक गंभीर समस्या है, जिससे जनजीवन प्रभावित होता है और जानमाल का बहुत नुकसान होता है। देश में कई ऐसे इलाके हैं, जहाँ प्रति वर्ष बाढ़ आती है। भारत में बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, केरल, असम, बिहार, हरियाणा और पंजाब ऐसे राज्य हैं जो बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इस वर्ष तो सूखे के लिए जाना जाने वाला राजस्थान प्रदेश भी बाढ़ की चपेट में आ गया।

बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है जो किसी क्षेत्र में अत्यधिक पानी के जमा होने के कारण होती है। यह अक्सर भारी बारिश का नतीजा है। कई क्षेत्रों को नदी या समुद्र के जल का स्तर बढ़ने के कारण, बांधों के टूटने के कारण और बर्फ की पिघलने के कारण बाढ़ का सामना करना पड़ता है। तटीय क्षेत्रों में तूफान और सूनामी बाढ़ का कारण बनते हैं।

आज देश में बाढ़ बहुत विनाशकारी साबित हो रही हैI पिछले 75 सालों में एक भी साल ऐसा नहीं गया, जब बाढ़ से फसल एवं अन्य संपत्ति को नुकसान न हुआ हो। प्रामाणिक संकेत हैं कि पिछले कुछ वर्षों में बाढ़ की प्रकृति और प्रभाव कहीं अधिक विनाशकारी और व्यापक हो गए हैं।

बाढ़ का पानी प्रभावित क्षेत्र के सामान्य कामकाज को बाधित करता है। भयावह बाढ़ के कारण बड़े पैमाने पर विनाश हो सकता है। जब मूसलाधार बारिश होती है तो मिट्टी पूरे पानी को अवशोषित नहीं कर पाती और इससे अक्सर मिट्टी का क्षरण होता है जिसके भयानक परिणाम होते हैं। मिट्टी के क्षरण के अलावा मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।

आज जरूरत है कि बाढ़ पर नियंत्रण हेतु प्रभावशाली उपायों पर गंभीर मंथन कर उन्हें अपनाने की। बाढ़ की विभीषिका से किस प्रकार जानमाल की क्षति को रोका जाय और कम किया जाय तथा लोगों का आर्थिक नुकसान कम-से-कम हो, इस दिशा में गंभीर प्रयास हों। जो लोग बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रह रहे हैं, उन्हें बाढ़ चेतावनी प्रणाली के बारे में जानकारी होना चाहिए और सरकार द्वारा बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बाढ़ से संबंधित जानकारी समय-समय पर दी जानी चाहिए ताकि बाढ़ से उत्पन्न नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सके।

जो भी छोटी-बड़ी नदियाँ हैं तथा बड़ी नदियों की सहायक नदियाँ हैं, उन सभी पर मजबूत बांध के निर्माण से मुख्य नदी में बाढ़ के खतरे को कम करने के साथ नदियों के जो ऊपरी जल संग्रहण क्षेत्र हैं, वहाँ पर वृक्षारोपण किया जाना चाहिए क्योंकि वृक्ष पानी को सोखते हैं और बाढ़ के प्रभाव को कम करते हैं। हमारे कृषि वैज्ञानिकों वृक्षारोपण के लिए लोगों को प्रेरित करने का प्रयास करना चाहिए।

पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी के समय नदियों को आपस में जोड़ने पर बल दिया गया, जो बाढ़ और सूखे के हालातों का सामना करने के लिये उल्लेखनीय प्रयास था। वर्तमान सरकार द्वारा भी इस दिशा में गंभीरतापूर्वक ध्यान देते हुए सार्थक प्रयास किया जा रहा है।

आशा है कि इस सम्मेलन में सभी विविध उत्पादन प्रणालियों में संसाधन का संरक्षण, भूमि क्षरण की स्थिति, मिट्टी और जल संरक्षण, जल संसाधन विकास, एकीकृत कृषि प्रणाली व भारत सरकार की विभिन्न प्रमुख योजनाओं पर विचार-विमर्श होगा तथा बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के सफल मेजबानी में यह राष्ट्रीय सम्मलेन अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल होगा।

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