सिर्फ राजस्थान ही नही, झारखंड में भी 60 दिनों में 178 बच्चों की मौत।

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रांची : राज्य की सबसे बड़ी अस्पताल रिम्स अपने स्वस्थ्य सुविधाओं को लेकर आये दिन चर्चा में बना रहता है। दैनिक अख़बार प्रभात ख़बर में प्रकाशित 1 रिपोर्ट के अनुसार राज्य के सबसे बड़े अस्पताल में पिछले 60 दिनों में 178 बच्चों की मौत हो चुकी है।

इस तरह के भयावह आंकड़े सामने आने के बाद अस्पताल का शिशु विभाग इस बात की समीक्षा करेगा कि आख़िर मौत की वज़ह क्या है।

डॉक्टरों के अनुसार उनके यंहा बच्चे अत्यंत गंभीर परिस्थिति में लाये जाते हैं। सिर्फ झारखंड ही नही अन्य राज्यों से भी स्थिति गम्भीर होने पर बच्चों को रिम्स लाया जाता है। कई बार बिना ऑक्सीजन और लाइफ सपोर्ट सिस्टम के ही परिजन दूर दराज से बच्चों को रिम्स ले आते हैं। इसके बावजूद भी डॉक्टरों के तरफ से उन्हें बचाने की भरपूर कोशिश की जाती है। कुछ बच्चे बच जाते हैं तो कुछ की मृत्यु हो जाती है। अगर समय पर सही इलाज हो तो मृत्यु दर में कमी आ जाएगी।

रिम्स से मिले आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2019 में पूरे साल के दौरान 1051 बच्चों की मौत विभिन्न कारणों से रिम्स में हुई। इनमें प्री-मेच्योर (समय से पहले जन्मे), कुपोषण और गंभीर रोगों से पीड़ित बच्चे शामिल थे। नवंबर में सबसे ज्यादा 119 बच्चों की मौत हुई है। वहीं दिसंबर में 59 बच्चों की मौत हुई है। 17 नवंबर को रिम्स के शिशु विभाग में सबसे ज्यादा 10 बच्चों की मौत हुई है। वहीं दिसंबर में 22 दिसंबर को सबसे ज्यादा पांच बच्चों की मौत हुई है।

  • नवंबर में सबसे ज्यादा 119 बच्चों की मौत हुई है,

  • वहीं दिसंबर में 59 बच्चों की मौत

  • 17 नवंबर को रिम्स के शिशु विभाग में सबसे ज्यादा 10 बच्चों की मौत हुई

  • जनवरी के पहले चार दिनों में आठ बच्चों की हुई मौत

राजस्थान में हो रहे बच्चों के मौत से पुरे देश में हड़कंप

उधर राजस्थान में बच्चों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। बच्चों की मौत के मामले में बीकानेर के पीबीएम शिशु हॉस्पिटल ने कोटा के जे.के. लोन अस्पताल को भी पीछे छोड़ दिया है। कोटा में जहां 35 दिनों में 110 बच्चों की मौत हुई वहीं बीकानेर के हॉस्पिटल में दिसंबर के 31 दिनों में 162 बच्चे काल के गाल में समा गए।

इन आंकड़ों का मतलब है कि हर दिन पांच से ज्यादा बच्चों की मौत हो रही है। महज दिसंबर महीने की बात करें तो इस अस्पताल में जन्मे और बाहर से आए 2219 बच्चे पीबीएम शिशु हॉस्पिटल में भर्ती हुए. इन्हीं में से 162 यानी 7.3 फीसदी बच्चों की मौत हो गई।