13 साल बाद 17 फरवरी को घर वापसी करेंगे बाबूलाल मरांडी : 19 साल एक नज़र

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{वार्ता स्पेशल : सत्यम जायसवाल, संपादक}

रांची/झारखंड : विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद से झारखंड विकास मोर्चा के प्रमुख बाबूलाल मरांडी लगातार सुर्खियों में रहे। खास वजह ये रही कि उनकी पार्टी को विधानसभा चुनाव में जब महज़ 3 सीट मिले तो जनता को जिज्ञासा होती रही कि उनकी पार्टी किसको समर्थन करेगी।

कुछ ही दिनों के बाद झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री ने वर्तमान मुख्यमंत्री को अपना निशर्त समर्थन दे दिया। इसके वावजूद राजनितिक गलियों में उनके भारतीय जनता पार्टी में जाने की चर्चाएं कम नहीं हुई। कारण रहा कि भारतीय जनता पार्टी के द्वारा नेता प्रतिपक्ष के नाम की घोषणा में देर करना। इस से मीडिया और जनता को अंदेशा होता रहा कि बाबूलाल मरांडी भारतीय जनता पार्टी में इस पद पर विराजमान हो सकते हैं। परन्तु अभी तक बाबूलाल मरांडी ने खुद से इस बारे में कुछ भी कहने से परहेज कर रखा था।

उनके मन की बात आखिर एक मौका मिलने पर बाहार आ गई। मौका था उनके पार्टी के विधायक का दिल्ली में कांग्रेस प्रमुख सोनिया गाँधी से मुलाकात करना। जिसके बाद बाबूलाल मरांडी ने स्पीकर को पत्र लिख कर सरकार को दिया गया समर्थन वापस लेने की बात कही। उन्होंने पत्र में लिखा कि कांग्रेस हमारे विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर रही है।

जिसके बाद एक एक कर उन्होंने अपने दोनों विधयकों बंधु तिर्की और प्रदीप यादव को पार्टी विरोधी गतिविधायों में संलिप्त होने के आरोप में निष्काषित कर दिया। अब पार्टी में सिर्फ एक विधायक वो स्वयं हैं।

8 फरवरी को दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री से की मुलाकात

भाजपा सूत्रों के अनुसार बाबूलाल को झारखंड विधानसभा में भाजपा विधायक दल का नेता बनाया जाएगा। मरांडी विधानसभा सदस्य हैं। वे गिरिडीह जिले के धनवार विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए हैं। मरांडी ने 8 फरवरी को दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम माथूर से मुलाकात कर भाजपा में शामिल होने के प्लान को अंतिम रूप दिया। इसके अगले दिन मरांडी ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिलकर प्लान के क्रियान्वयन पर विचार-विमर्श किया। बाबूलाल मरांडी फिलहाल भाजपा में शामिल होकर बगैर कोई पद लिए ही कार्य करना चाहते हैं। लेकिन, भाजपा का दवाब है कि वे विधानसभा में विरोधी दल के नेता की भूमिका का निर्वहन करें। भाजपा ने विधानसभा में अब तक किसी को विधायक दल का नेता नहीं बनाया है। संभावना व्यक्त की जा रही है कि भाजपा में शामिल होने के कुछ दिनों बाद विधायक दल की बैठक होगी। उसमें सर्वसम्मति से बाबूलाल के विधायक दल के नेता बनाने की घोषणा कर दी जाएगी।

समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा उपस्थित रहेंगे

सूत्रों के अनुसार 17 को रांची में मिलन समारोह का आयोजन किया जाएगा। इस समारोह में मरांडी भाजपा में शामिल होंगे। इस माैके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा उपस्थित रहेंगे। कार्यक्रम आयोजन की जिम्मेवारी भाजपा की होगी। कार्यक्रम में जाकर बाबूलाल भाजपा में शामिल होने की घोषणा करेंगे। हालांकि अभी कार्यक्रम स्थल फाइनल नहीं हुआ है। पहले मोरहाबादी मैदान में कार्यक्रम करने की बात थी लेकिन वह खाली नहीं है। प्रभात तारा मैदान या हरमू मैदान में से किसी एक में कार्यक्रम करने की तैयारी में भाजपा जुट गई है।

एक नजर बाबूलाल मरांडी

इनका जन्म 11 जनवरी 1958 को वर्तमान झारखंड के गिरिडीह जिले के कोदाईबांक नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम छोटे लाल मरांंडी तथा माता का नाम श्रीमती मीना मुर्मू है।

इनकी शिक्षात्मक योग्यता स्नातक है। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान मरांडी आरएसएस से जुड़ गए। आरएसएस से पूरी तरह जुड़ने से पहले मरांडी ने गांव के स्‍कूल में कुछ सालों तक कार्य किया। इसके बाद वे संघ परिवार से जुड़ गए। उन्‍हें झारखंड क्षेत्र के विश्‍व हिन्‍दू परिषद का संगठन सचिव बनाया गया।

1983 में वे दुमका जाकर संथाल परगना डिवीजन में कार्य करने लगे। 1989 में इनकी शादी शांतिदेवी से हुई। एक बेटा भी हुआ अनूप मरांडी, जिसकी 27 अक्टूबर 2007 को झारखंड के गिरिडीह क्षेत्र में हुए नक्‍सली हमले में मौत हो गई।

1991 में मरांडी भाजपा के टिकट पर दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। 1996 में वे फिर शिबू शोरेन से हारे। इसके बाद बीजेपी ने 1998 में उन्हेंविधानसभा चुनाव के दौरान झारखंड बीजेपी का अध्‍यक्ष बनाया। पार्टी ने उनके नेतृत्‍व में झारखंड क्षेत्र की 14 लोकसभा सीटों में से 12 पर कब्‍जा किया।

1998 के चुनाव में उन्होंने शिबू शोरेन को संथाल से हराकर चुनाव जीता था, जिसके बाद एनडीए की सरकार में बिहार के 4 सांसदों को कैबिनेट में जगह दी गई। इनमें से एक बाबूलाल मरांडी थे।

2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड राज्‍य बनने के बाद एनडीए के नेतृत्‍व में बाबूलाल मरांडी ने राज्‍य की पहली सरकार बनाई।

उस समय के राजनीति विशेषज्ञों के अनुसार मरांडी राज्‍य को बेहतर तरीके से विकसित कर सकते थे। राज्‍य की सड़कें, औद्योगिक क्षेत्र तथा रांची को ग्रेटर रांची बना सकते थे। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने कई सराहनीय कदम उठाये। छात्राओं के लिए साइकिल की व्यवस्था, ग्राम शिक्षा समिति बनाकर स्थानीय विद्यालयों में पारा शिक्षकों की बहाली, आदिवासी छात्र छात्राओं के लिए प्लेन पायलट की प्रशिक्षण, सभी गाँवों, पंचायतों और प्रखण्डों में आवश्यकतानुसार विद्यालयों का निर्माण, राज्य में सड़कें, बिजली और पानी की उचित व्यवस्था के लिए अन्य योजनाओं की शुरुआत की। जनता को विश्वास होने लगा था झारखण्ड राज्य विकास की ओर अग्रेसित हो रहा है। हालांकि मरांडी उनके इस विश्‍वास को कम समय में पूरा नहीं कर सके और उन्‍हें जदयू के हस्‍तक्षेप के बाद सत्‍ता छोड़ अर्जुन मुंडा को सत्‍ता सौंपनी पडी़।

इसके बाद उन्‍होंने राज्‍य में एनडीए को विस्‍तार (विशेषकर राची में) देने का कार्य किया। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्‍होंने कोडरमा सीट से चुनाव जीता, जबकि अन्‍य उम्‍मीदवार हार गए। मरांडी ने 2006 में कोडरमा सीट सहित बीजेपी की सदस्‍यता से भी इस्तीफा देकर ‘झारखंड विकास मोर्चा’ नाम से नई राजनीतिक पार्टी बनाई।

बीजेपी के 5 विधायक भी भाजपा छोड़कर इसमें शामिल हो गए। इसके बाद कोडरमा उपचुनाव में वे निर्विरोध चुन लिए गए। 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्‍होंने अपनी पार्टी की ओर से कोडरमा सीट से चुनाव लड़कर बड़ी जीत हासिल की।

2014 में हुए विधानसभा चुनाव में ‘झारखंड विकास मोर्चा’ को मात्र 8 सीटें मिली। जिसमें खुद बाबूलाल मरांडी धनवार सीट से राज कुमार यादव कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट-लेनिनिस्ट)(लिबरेशन) से चुनाव हर गए। बाद में इनके पार्टी के 6 विधायक भी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए।

राजनीतिक जीवन

-1983 में संघ ने उन्हें संताल परगना इलाके में विश्व हिन्दू परिषद के संगठन मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई

-1991 में भाजपा के महामंत्री गोविन्दाचार्य ने भाजपा में शामिल किया

-1991 में पहली बार झामुमो के शिबू सोरेन के खिलाफ दुमका लोकसभा से खड़े हुए, हार मिली।

-1996 में महज 5000 वोट से शिबू सोरेन से हारे

-1996 में पार्टी ने उन्हें वनांचल भाजपा का अध्यक्ष नियुक्त किया

-1998 के लोकसभा चुनाव में उन्हें शिबू सोरेन को हराने में सफलता पाई

-1999 के चुनाव में उन्होंने शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन को दुमका से हराया

-1999 में अटल सरकार में उन्हें वन पर्यावरण राज्य मंत्री बनाया गया

-2000 में झारखंड के पहले मुख्यमंत्री चुने गए

-2003 में दल के आंतरिक विरोध के कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद त्यागना पड़ा।

-2006 में झारखंड विकास मोर्चा नामक पार्टी का गठन किया।

-2009 के लोकसभा चुनाव में उन्‍होंने अपनी पार्टी की ओर से कोडरमा सीट से चुनाव लड़कर बड़ी जीत हासिल की।

-2014 के विधानसभा चुनाव में धनवार सीट से चुनाव हार गए।

-2019 के विधानसभा चुनाव में धनवार सीट से चुनाव जीत गए।