8 दिन पहले लोगो ने किया था झोपडी उजाड़ने की कोशिश , आज तक नहीं लिया प्रशासन ने कोई एक्शन

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संवाददाता- विवेक चौबे

गढ़वा : 15 वर्षों से रह रहे दो दलित समुदाय की घटना के आठ दिन बीत जाने के बाद भी शासन प्रशासन किसी ने भी सुधि नही लिया। पिछले शुक्रवार को ही सैकड़ो लोगों ने उक्त दो महादलित समुदाय के लोगों को जगह खाली करने की अल्टीमेटम देते हुए उनकी झुगी झोपड़ी को उजाड़ने का प्रयास किया गया था। उस घटना के बाद से उक्त परिवार इस तपती धूप में किसी तरह जीवन गुजारने के लिए मजबूर हैं। अब तक शासन प्रशासन किसी ने भी उनकी सुधि नहीं लिया है।

अपनी दर्द बयां करते हुए पीड़िता- चंद्रावती देवी ने कहा कि सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण आकर हमारी झोपड़ी उजाड़ दिए। घर के अंदर रखे थाली, लोटा, हड़िया-डेकची सब कुछ बाहर फेंक दिए थे। वह पूछती है की हमलोग कहाँ जाएं। जाएं तो कहां ? झोपड़ी उजड़ जाने के बाद इस धूप में बाल बच्चों को लेकर कहाँ जाएं। हमारी दुःख देखने वाला कौन है।

वहीं दुलारी कुवंर मुसहरीन ने बताया कि सभी ने आकर घर उजाड़ कर फेंक दिए। बाल बच्चों के साथ घूम-घूम कर मांगते खाते हैं। झोपड़ी उजड़ने के बाद एक जलेबी पेंड के नीचे रहते हैं। साथ ही उसने कहा कि सरकार हमलोग को घर देने का काम करे।

जबकि पीड़ित- सुरेन्द्र राम डोम ने कहा कि हम सभी सुप दउरी बीनकर बेंचने वाले गरीब व्यक्ति हैं। सुगर मुर्गी पालते हैं। वही रोजी रोटी है। जगह जमीन भी नही है। हमलोग यह जगह छोड़ कर कहाँ जाएं। हमारी स्थिति को जानते हुए भी गांव वाले भगा रहे हैं।

वहीं सकेन्द्र राम डोम ने कहा कि गांव वाले भगा रहे हैं तो हमलोग भाग कर कहाँ जाएंगे। हमलोग के पास कोई जगह जमीन नही है।

वहीं बैजनाथ मुसहर की पुत्री- आशा कुमारी ने कहा कि हम दी छोटे-छोटे बच्चे ही केवल थे। माता-पिता की अनुपस्थिति में ग्रामीणों ने हमलोगों का घर उजाड़ दिया। साथ ही यह धमकी भी दी जा रही थी कि यहां से जल्द भागो वरना इसी झोपड़ी में आग लगाकर जला देंगे। साथ ही उसने बताया कि सोने के लिए एक चटाई थी, वह भी गांव के लोग ले गए।

दलित परिवार को न ही इन्हें शिक्षा प्रणाली से बेहतर तरीके से जोड़ने का काम किया गया, न ही इनकी रहने की कोई अच्छी व स्थायी व्यवस्था की गई। यह एक ऐसी जाति है, जो जहां चाहे वहां भी रहने को मजबूर है। अर्थात जहां सांझ वहां बिहान। उक्त परिवार की जिंदगी पहले भी बेहतर नहीं थी आज भी बदतर है। गलती तो करना इंसान का काम है वहीं क्षमा करना भगवान का काम है। जब किसी से कोई गलती हो जाती है तो उसके लिए प्रशाशन व कानून है। किन्तु कोई भी व्यक्ति अपने हाथ में कानून नहीं ले सकता है। वहीं यदि किसी ने कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश की तो प्रशाशन द्वारा उनपर कार्यवाई भी की जाती है। यह मामला है, जिले के कांडी प्रखण्ड क्षेत्र अंतर्गत हरिगावां मोड़ पर स्थित एक पहाड़ी पर तकरीबन 15 वर्षों से रहने वाले डोम व 10 वर्षों से रहने वाले मुसहर जाति की, जिनको हरिगावां गांव के ग्रामीणों ने भगाने का निर्णय लिया। इसी निर्णय के साथ बीते शुक्रवार की सुबह वहां सैकड़ों लोग पहुंचे। पहुंचकर शाम 4 बजे तक जगह खाली करने का अल्टीमेटम दे डाला। किन्तु दिए गए अल्टीमेटम का कोई असर नहीं दिखा। साफ शब्दों में कहें तो उक्त दोनों समुदाय के लोग यहां से कहीं जाने वाले नहीं हैं।

उक्त दोनों समुदाय के परिवारों ने कहा कि अपने परिवार के पूरे सदस्यों के साथ हमलोग यहां अमन-चैन की जिंदगी जी रहे हैं। प्रशासन भगाए या गांव के लोग, हमलोग आखिर जाएं भी तो कहां। ग्रामीणों ने फुस के घर को उजाड़ कर घर मे रखे सभी सामानों को बाहर निकाल कर फेंक दिया।

उनके परिजनों को ग्रामीणों के द्वारा भी भगाने का प्रयत्न किया गया। चुकी दोनों समुदाय किसी के व्यक्तिगत जमीन में निवास नहीं करते, बल्कि यह जमीन वन विभाग की है। सैकड़ों ग्रामीणों ने तो जगह खाली करने का अल्टीमेटम तो दिया ही। वहीं कई मुसहर छोटे-छोटे बच्चों के साथ एक जलेबी के पेड़ की छांव में रात व दीन गुजारते हैं। हमलोग कैसे करें अपना जीवन यापन। उपस्थित सभी मुसहर महिलाओं ने सरकार से राशन कार्ड बनाने व आवास देने की भी मांग की है।

अब सवाल यह कि ग्रामीणों द्वारा मुसहर के फुस की घरों को क्यों उजाड़ा गया, सभी सामान बाहर क्यों रख दिए गए। इस पर प्रशाशन व अधिकारियों ने कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया। जांच कर दोषियों के विरुद्ध कार्यवाई क्यों नहीं कि गयी। मौके पर- सकेन्द्र डोम, सुरेंद्र राम डोम, छोटे लाल डोम, सीताराम डोम, कौशिला देवी व दुलारी कुवँर, राजिंद्र मुसहर, चंद्रावती देवी, छठनी देवी, उषा देवी सहित दोनों समुदायों के पूरे परिवार के सदस्य उपस्थित थे।