नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम मामले में यह स्पष्ट किया है कि वसीयत करने वाले की इच्छा सर्वोपरि होती है, भले ही उसका फैसला समानता के सिद्धांतों से मेल न खाता हो। शीर्ष अदालत ने केरल निवासी एन. एस. श्रीधरन की वसीयत को वैध ठहराते हुए उनकी बेटी शाइला जोसेफ को पैतृक संपत्ति से पूरी तरह बेदखल कर दिया है।
दरअसल, एन. एस. श्रीधरन ने अपनी नौ संतानों में से एक बेटी शाइला जोसेफ को इसलिए अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिया था क्योंकि उसने अपने समुदाय के बाहर विवाह किया था। पिता की मृत्यु के बाद इस वसीयत को चुनौती देते हुए शाइला ने संपत्ति में बराबर हिस्से की मांग की थी।
हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अहसनुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने केरल हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया। निचली अदालतों ने वसीयत को संदिग्ध मानते हुए संपत्ति को नौं बच्चों में समान रूप से बांटने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसीयत पूरी तरह से प्रमाणित और वैध है, इसलिए उसमें किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘जो वसीयत स्पष्ट रूप से सिद्ध हो चुकी है, उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले और डिक्री को रद्द किया जाता है। वादी (शाइला) को अपने पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है।’
समानता का सिद्धांत लागू नहीं होगा
शाइला जोसेफ की ओर से वरिष्ठ वकील पी. बी. कृष्णन ने दलील दी कि उनकी मुवक्किल केवल 1/9वें हिस्से की मांग कर रही हैं, जो कुल संपत्ति का बहुत छोटा भाग है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया।
पीठ ने साफ किया कि वसीयत के मामलों में समानता का सवाल नहीं उठता। अदालत ने कहा, हम समानता की बात नहीं कर रहे हैं। वसीयत करने वाले की इच्छा सर्वोपरि होती है। उसकी अंतिम इच्छा से कोई विचलन नहीं किया जा सकता।”
‘समझदारी के नियम’ पर भी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वसीयत के मामलों में तथाकथित ‘समझदारी का नियम’ (Rule of Prudence) हर स्थिति में लागू नहीं होता। अदालत के अनुसार, यदि वसीयत के जरिए सभी उत्तराधिकारियों को पूरी तरह से वंचित कर दिया गया होता, तब अदालत हस्तक्षेप कर सकती थी।
पीठ ने कहा, ‘हम खुद को वसीयत करने वाले के स्थान पर नहीं रख सकते। न ही हम अपनी सोच को उसकी सोच से बदल सकते हैं। संपत्ति किसे और कैसे दी जाए, यह तय करना पूरी तरह वसीयतकर्ता का अधिकार है।’
भाई-बहनों की अपील स्वीकार
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने शाइला जोसेफ द्वारा दायर संपत्ति के समान बंटवारे के मुकदमे को खारिज करते हुए उनके भाई-बहनों की अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने यह भी माना कि बेटी को वसीयत से बाहर रखने का कारण अदालत की दृष्टि में नैतिक या सामाजिक कसौटी पर परखा नहीं जा सकता।
क्यों अहम है यह फैसला
कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह फैसला साफ संकेत देता है कि
वसीयत में व्यक्तिगत पसंद और इच्छा को सर्वोच्च महत्व मिलेगा। अदालतें नैतिकता या समानता के आधार पर वसीयत को नहीं बदलेंगी। जब तक वसीयत कानूनी रूप से वैध और प्रमाणित है, तब तक उसे चुनौती देना मुश्किल होगा।
यह निर्णय एक बार फिर इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि उत्तराधिकार कानून में भावनाओं से ज्यादा कानून और वसीयतकर्ता की मंशा मायने रखती है।
समुदाय से बाहर शादी करने पर बेटी को संपत्ति में हिस्सा नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने दिया पिता का साथ











