नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी एजेंसी या ठेकेदार के माध्यम से अनुबंध पर नियुक्त कर्मचारी, सरकारी विभागों या निकायों के नियमित कर्मचारियों के समान वेतन, भत्ता या अन्य सेवा लाभों की मांग नहीं कर सकते। शीर्ष अदालत ने कहा कि नियमित सरकारी नौकरी एक सार्वजनिक संपत्ति है, जिस पर देश के प्रत्येक नागरिक का समान अधिकार होता है और इसकी नियुक्ति पूरी तरह पारदर्शी प्रक्रिया से ही की जानी चाहिए।
दो जजों की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि यदि नियमित और अनुबंध कर्मचारियों के बीच कोई अंतर नहीं रखा जाएगा, तो स्थायी, अनुबंध और तदर्थ नियुक्ति जैसी अलग-अलग प्रक्रियाओं का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। अदालत ने साफ किया कि कानून ऐसी स्थिति की अनुमति नहीं देता।
हाईकोर्ट का आदेश रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा वर्ष 2018 में दिए गए उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें नगर निगम के लिए तीसरे पक्ष यानी ठेकेदार के माध्यम से वर्ष 1994 में रखे गए सफाई कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों के समान वेतन और भत्ते देने का निर्देश दिया गया था।
यह मामला आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले की नंदयाल नगरपालिका परिषद से जुड़ा था। नगरपालिका परिषद ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
नियुक्ति प्रक्रिया में है बुनियादी अंतर
शीर्ष अदालत ने कहा कि ठेकेदार या एजेंसी के जरिए की जाने वाली नियुक्ति पूरी तरह नियोक्ता की मर्जी पर आधारित होती है, जबकि नियमित सरकारी नियुक्ति एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत होती है। यही कारण है कि कानून में दोनों श्रेणियां पूरी तरह अलग मानी गई हैं।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि नियमित सरकारी नियुक्तियों में विशेष सुरक्षा उपाय इसलिए रखे जाते हैं ताकि किसी तरह का पक्षपात या बाहरी प्रभाव न हो। इन नियुक्तियों में योग्यता के आधार पर, पूरी तरह पारदर्शी और कानून द्वारा मान्य प्रक्रिया अपनाई जाती है।
‘समानता का सिद्धांत’ लागू नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि कोई कर्मचारी लंबे समय से काम कर रहा है या उसका कार्य नियमित कर्मचारियों जैसा है, उसे नियमित कर्मचारी के समान अधिकार नहीं दिए जा सकते। ऐसा करना संविधान के तहत समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन होगा, क्योंकि इससे उन योग्य उम्मीदवारों का हक मारा जाएगा, जिन्हें नियमित भर्ती प्रक्रिया के जरिए आवेदन करने का अवसर मिलना चाहिए।
ठेकेदार बदलते रहने का भी उल्लेख
अदालत ने अपने फैसले में यह भी ध्यान दिलाया कि संबंधित मामले में सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति समय-समय पर अलग-अलग ठेकेदारों के माध्यम से होती रही है। ऐसे में उन्हें नगरपालिका के नियमित कर्मचारी मानना कानूनी रूप से सही नहीं ठहराया जा सकता।
दूरगामी असर
इस फैसले को सरकारी विभागों, नगर निकायों और सार्वजनिक संस्थानों में अनुबंध पर काम कर रहे कर्मचारियों के मामलों में एक अहम नजीर माना जा रहा है। इससे यह साफ हो गया है कि नियमित सरकारी नौकरी और ठेके पर दी गई नौकरी के बीच कानूनी अंतर को खत्म नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में समान वेतन और नियमितीकरण से जुड़े कई मामलों में मार्गदर्शक साबित हो सकता है।











