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कुख्यात नक्सली कुंदन पाहन और राम मोहन सिंह मुंडा 17 साल पुराने मामले में बरी, सबूतों के अभाव में कोर्ट का बड़ा फैसला

On: January 13, 2026 9:19 PM
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रांची: करीब 17 वर्ष पुराने नक्सली मुठभेड़ और आतंकी गतिविधियों से जुड़े एक बहुचर्चित मामले में रांची सिविल कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कुख्यात नक्सली कुंदन पाहन उर्फ विकास जी और राम मोहन सिंह मुंडा को सभी आरोपों से बरी कर दिया। यह फैसला अपर न्यायायुक्त शैलेंद्र कुमार की अदालत ने साक्ष्य के अभाव में सुनाया।


अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में पूरी तरह असफल रहा। दोनों आरोपियों पर आईपीसी, आर्म्स एक्ट, सीएलए एक्ट और यूएपीए जैसी गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा चल रहा था, लेकिन ठोस साक्ष्य के अभाव में उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया।


बुंडू थाना कांड संख्या 18/2009 से जुड़ा है मामला


यह मामला बुंडू थाना कांड संख्या 18/2009 से संबंधित है। प्राथमिकी के अनुसार, 5 फरवरी 2009 की रात पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि इलाके में नक्सली संगठन के सदस्य हथियारों के साथ मौजूद हैं। सूचना के आधार पर पुलिस ने सर्च ऑपरेशन चलाया। पुलिस का दावा था कि इस दौरान उग्रवादियों के साथ मुठभेड़ हुई और दोनों ओर से भारी गोलीबारी हुई।


पुलिस ने मौके से हथियार और कारतूस बरामद करने का भी दावा किया था। हालांकि, मामले की सुनवाई के दौरान ये दावे न्यायालय में टिक नहीं पाए। दोनों आरोपी 23 जनवरी 2017 से न्यायिक हिरासत में थे।


अभियोजन पक्ष की गवाही बेहद कमजोर


मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से केवल एक ही गवाह पेश किया गया, जो स्वयं इस मामले के सूचक और तत्कालीन बुंडू थाना प्रभारी एसआई रविकांत प्रसाद थे। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इतने गंभीर आरोपों वाले मामले में न तो कोई स्वतंत्र गवाह प्रस्तुत किया गया और न ही अन्य पुलिसकर्मियों की गवाही कराई जा सकी।


अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि वर्षों तक समन और वारंट जारी होने के बावजूद गवाहों को पेश नहीं किया जा सका, जिससे अभियोजन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।


पहचान और गिरफ्तारी पर भी उठे सवाल


अदालत ने अपने निर्णय में पहचान और गिरफ्तारी की प्रक्रिया को भी संदेहास्पद बताया। सूचक गवाह ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उन्होंने न तो आरोपियों को घटना स्थल पर देखा था और न ही उनकी गिरफ्तारी की थी। उन्होंने दोनों आरोपियों को पहली बार अदालत में ही देखा।


फायरिंग के दावे पर नहीं मिला कोई ठोस प्रमाण


पुलिस द्वारा मुठभेड़ के दौरान 784 राउंड फायरिंग किए जाने का दावा किया गया था, लेकिन जांच के दौरान एक भी खोखा बरामद नहीं हुआ। अदालत ने यह भी नोट किया कि कथित रूप से जब्त किए गए हथियार और कारतूस न तो मौके पर विधिवत सील किए गए और न ही उन्हें अदालत में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया।
इसके अलावा, घटना स्थल से खून या खून लगी मिट्टी की जब्ती से संबंधित कोई ठोस प्रमाण भी रिकॉर्ड पर नहीं लाया जा सका।


सभी आरोपों से पूर्णतः दोषमुक्त


इन तमाम तथ्यों और साक्ष्यों के अभाव को देखते हुए अदालत ने कुंदन पाहन उर्फ विकास जी और राम मोहन सिंह मुंडा को आईपीसी की धारा 147, 148, 353/149, 307/149, आर्म्स एक्ट, सीएलए एक्ट तथा यूएपीए की धारा 13 सहित सभी आरोपों से बरी कर दिया।


मामले में बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ईश्वर दयाल किशोर ने बहस की। अदालत के इस फैसले को नक्सल मामलों में जांच और अभियोजन की कमजोरियों के रूप में भी देखा जा रहा है, जिसने एक बार फिर पुलिसिया दावों और कानूनी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Vishwajeet

मेरा नाम विश्वजीत कुमार है। मैं वर्तमान में झारखंड वार्ता (समाचार संस्था) में कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हूं। समाचार लेखन, फीचर स्टोरी और डिजिटल कंटेंट तैयार करने में मेरी विशेष रुचि है। सटीक, सरल और प्रभावी भाषा में जानकारी प्रस्तुत करना मेरी ताकत है। समाज, राजनीति, खेल और समसामयिक मुद्दों पर लेखन मेरा पसंदीदा क्षेत्र है। मैं हमेशा तथ्यों पर आधारित और पाठकों के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूं। नए विषयों को सीखना और उन्हें रचनात्मक अंदाज में पेश करना मेरी कार्यशैली है। पत्रकारिता के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करता हूं।

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