नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम को प्रभावी ढंग से लागू कराने की दिशा में एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे निजी गैर-सहायता प्राप्त, गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों में आर्थिक एवं सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण को सख्ती से लागू करने के लिए आवश्यक नियम और प्रक्रियाएं तैयार करें।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि गरीब और वंचित तबके के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना केवल एक कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय मिशन होना चाहिए।
मंगलवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान में निहित भाईचारे की भावना पर भी जोर दिया। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान का उद्देश्य तभी साकार होगा, जब एक रिक्शा चालक का बच्चा, एक करोड़पति या सुप्रीम कोर्ट के जज के बच्चे के साथ एक ही स्कूल में पढ़ेगा।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सामाजिक समानता और समावेशी शिक्षा के बिना लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता।
नियम बनाने की प्रक्रिया शुरू
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने निर्देश दिया कि RTE अधिनियम की धारा 12(1)(c) के तहत 25% मुफ्त सीटों के प्रावधान को लागू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR), राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCRs) राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सलाहकार परिषदों से परामर्श लेकर आवश्यक नियम और कानून तैयार करें।
31 मार्च तक हलफनामा दाखिल करने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने NCPCR को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जानकारी जुटाए कि उन्होंने इस संबंध में क्या कदम उठाए हैं। आयोग को निर्देश दिया गया है कि वह 31 मार्च तक कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल करे, जिसमें नियमों और कानूनों की स्थिति का विवरण हो।
मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को निर्धारित की गई है।
याचिका की पृष्ठभूमि
यह मामला एक व्यक्ति द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि वर्ष 2016 में उसके बच्चों को पड़ोस के एक निजी स्कूल में मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के लिए प्रवेश नहीं दिया गया, जबकि वहां सीटें उपलब्ध थीं।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने मुंबई उच्च न्यायालय का रुख किया था। अब सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले में EWS श्रेणी के छात्रों को प्रवेश के दौरान आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों पर विचार कर रहा है।
शिक्षा में समान अवसर पर जोर
शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि निजी गैर-सहायता प्राप्त, गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों को RTE कानून से बाहर नहीं रखा जा सकता और उन्हें हर हाल में 25 प्रतिशत सीटें गरीब और वंचित बच्चों के लिए मुफ्त आरक्षित करनी होंगी।













