जमशेदपुर: आधुनिकता के दौर में भी अंधविश्वास और पारंपरिक मान्यताएं आदिवासी समाज में गहराई से जड़ें जमाए हुए हैं। इसका ताजा उदाहरण रविवार को जमशेदपुर के शंकोसाई स्थित हरमंगेया टोला में देखने को मिला, जहां मागे पर्व के अंतिम दिन ‘हो’ समाज द्वारा एक अनोखी परंपरा निभाई गई। समाज की सदियों पुरानी मान्यता के अनुसार, जिन बच्चों के ऊपरी दांत सबसे पहले निकलते हैं, उन पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव माना जाता है। इसी कथित ग्रह दोष के निवारण के लिए दो मासूम बच्चों की प्रतीकात्मक शादी कुत्ते से कराई गई। मान्यता है कि ऐसा करने से बच्चों के जीवन में भविष्य में होने वाली किसी अनहोनी या दुर्घटना की आशंका टल जाती है।
इस परंपरा के तहत दो बच्चों (चार वर्षीय और दो वर्षीय) की अलग-अलग बारात निकाली गई। गाजे-बाजे के साथ पूरे टोले में बारात घुमाई गई, जिसमें बस्ती के लोग उत्साहपूर्वक शामिल हुए। ढोल-नगाड़ों की थाप पर लोग झूमते और नाचते नजर आए, जिससे माहौल किसी वास्तविक शादी जैसा बन गया। विवाह से पहले समधी मिलन, मंगनी, हल्दी, पांव पूजा सहित सभी पारंपरिक रस्में पूरे विधि-विधान से निभाई गईं। इसके बाद साड़ पेड़ के नीचे विवाह संपन्न कराया गया। समाज की मान्यता है कि साड़ पेड़ के नीचे विवाह करने से बच्चों का ग्रह दोष पेड़ अपने ऊपर ले लेता है और बच्चे दोषमुक्त हो जाते हैं।
‘हो’ समाज के बुजुर्गों का कहना है कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी पूरी आस्था के साथ निभाई जाती है। उनका मानना है कि इस तरह के अनुष्ठान बच्चों के सुखद और सुरक्षित भविष्य के लिए आवश्यक हैं।












