Python blood may point to weight loss treatment: वजन घटाने की दवाओं के क्षेत्र में एक नई और दिलचस्प खोज सामने आई है। अजगर (पायथन) के खून में पाए गए एक खास मेटाबोलाइट ने शोधकर्ताओं का ध्यान खींचा है। शुरुआती अध्ययन बताते हैं कि यह तत्व भविष्य में मोटापा नियंत्रित करने की सुरक्षित दवा के रूप में विकसित हो सकता है, वह भी कम साइड-इफेक्ट्स के साथ।
अजगर का असाधारण मेटाबोलिज्म
अजगर का पाचन तंत्र और मेटाबोलिज्म बेहद अनोखा होता है। ये लंबे समय तक बिना भोजन के रह सकते हैं और फिर अचानक बड़े शिकार को निगल लेते हैं। खाना खाने के बाद इनके शरीर में कई चौंकाने वाले बदलाव होते हैं। मेटाबोलिज्म लगभग 40 गुना तक बढ़ जाता है। दिल का आकार कुछ प्रजातियों में 24% से अधिक बढ़ सकता है। आंतों का माइक्रोबायोम तेजी से सक्रिय होकर भोजन को प्रोसेस करता है। जहां अन्य जीवों के लिए ऐसा डाइटिंग नुकसानदेह हो सकता है, वहीं अजगर में इसके लिए विशेष जैविक अनुकूलन मौजूद हैं।
शोध में क्या मिला?
वैज्ञानिकों की एक टीम ने भोजन के बाद अजगर के खून में मौजूद रासायनिक तत्वों (मेटाबोलाइट्स) का विश्लेषण किया। इस दौरान 200 से अधिक मेटाबोलाइट्स में वृद्धि देखी गई, लेकिन सबसे अलग एक खास तत्व para-tyramine-O-sulfate (pTOS) नजर आया। भोजन के बाद pTOS का स्तर लगभग 1000 गुना तक बढ़ गया। यह मेटाबोलाइट आंतों के बैक्टीरिया द्वारा अमीनो एसिड टायरोसिन को तोड़ने पर बनता है। हालांकि इंसानों में भी इसके मौजूद होने के संकेत मिले हैं, लेकिन इसके प्रभाव अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।
चूहों पर परीक्षण में चौंकाने वाले परिणाम
जब इस मेटाबोलाइट को चूहों पर आजमाया गया, तो दिलचस्प नतीजे सामने आए। चूहों की भूख में कमी आई। उन्होंने कम भोजन किया, जिससे वजन घटा। सबसे खास बात, पाचन संबंधी समस्या नहीं हुई। मांसपेशियों का नुकसान नहीं हुआ और ऊर्जा स्तर सामान्य बना रहा। यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मौजूदा कई वजन घटाने वाली दवाओं में ऐसे साइड-इफेक्ट्स आम होते हैं।
दिमाग पर कैसे असर करता है?
शोध में यह भी पाया गया कि pTOS दिमाग के एक महत्वपूर्ण हिस्से, ‘वेंट्रोमेडियल हाइपोथैलेमस’ को सक्रिय करता है। यह क्षेत्र भूख, तृप्ति और ऊर्जा संतुलन को नियंत्रित करता है। संभावना है कि यही मेटाबोलाइट शरीर को संकेत देता है कि अब भोजन की आवश्यकता नहीं है।
भविष्य की संभावनाएं
शोधकर्ताओं का मानना है कि pTOS एक प्राकृतिक ‘एपेटाइट सप्रेसेंट’ (भूख कम करने वाला तत्व) के रूप में काम कर सकता है। यदि आगे के अध्ययन सफल रहे, तो यह मोटापे के इलाज में एक नई दिशा दे सकता है। खासतौर पर ऐसी दवा के रूप में जिसमें कम दुष्प्रभाव हों।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इंसानों पर इसके उपयोग से पहले अभी व्यापक शोध और परीक्षण जरूरी हैं। फिलहाल यह खोज एक संभावित रास्ता जरूर दिखाती है, लेकिन इसे व्यावहारिक दवा बनने में समय लगेगा।













