July 26, 2026

राज्यपाल सचिवालय पहुंची स्पेशल ऑडिट रिपोर्ट: एक काम के लिए दो कंपनियों को भुगतान, अकेले एनपीयू में 2.69 करोड़ रुपये का गबन

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अन्य विश्वविद्यालयों में भी भुगतान की जांच शुरू हो गयी. झारखंड के सरकारी विश्वविद्यालयों की परीक्षा प्रणाली में करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है. वित्त विभाग की विशेष ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्हीं कार्यों के लिए बाहरी एजेंसी को भुगतान किया गया, जिनके लिए राज्य सरकार ने पहले ही चांसलर पोर्टल प्रणाली लागू कर दी थी. रिपोर्ट में संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच और उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट राज्यपाल सचिवालय को भेज दी गयी है. ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक अकेले नीलांबर पीतांबर यूनिवर्सिटी (एनपीयू) में 2,68,73,790 रुपये के भुगतान का गबन किया गया है. रिपोर्ट के बाद अब अन्य विश्वविद्यालयों में भी चांसलर पोर्टल के जरिये एजेंसियों को किये गये काम के भुगतान का आकलन शुरू हो गया है. विश्वविद्यालयों में परीक्षा संबंधी कार्य नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के माध्यम से किया जाता है। जानें…क्या कहती है ऑडिट रिपोर्ट रिपोर्ट के मुताबिक, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग ने वर्ष 2018-19 से सभी सरकारी विश्वविद्यालयों में चांसलर पोर्टल लागू किया था. राज्यपाल के निर्देश पर एनआइसी, रांची ने यह पोर्टल विकसित किया है. पोर्टल का उद्देश्य प्रवेश, पंजीकरण, परीक्षा, परिणाम और डिग्री संबंधी प्रक्रियाओं को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संचालित करना था। इसके लिए विश्वविद्यालयों को प्रशिक्षण दिया गया और एनआईसी के तकनीकी प्रतिनिधियों को भी तैनात किया गया। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्वविद्यालयों ने पोर्टल का उपयोग मुख्य रूप से ऑनलाइन प्रवेश और पंजीकरण तक ही सीमित रखा है। परीक्षा से संबंधित कार्य बाहरी एजेंसी के माध्यम से कराया गया. आपत्ति : चांसलर पोर्टल का काम भी एजेंसी के माध्यम से कराया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, यूनिवर्सिटी और एजेंसी के बीच हुए समझौते में चांसलर पोर्टल के जरिए जो काम होना था, वह भी शामिल था. ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि इन कार्यों के लिए एजेंसी को भुगतान किया गया था. रिपोर्ट में इसे वित्तीय अनियमितता बताते हुए संबंधित भुगतान पर आपत्ति दर्ज करायी गयी है. आपत्ति जताने के बाद परीक्षा नियंत्रक को हटा दिया गया. ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक डॉ. रविशंकर ने एजेंसी के बिलों पर आपत्ति दर्ज कराई थी। इसके बाद उन्हें पद से हटा दिया गया. रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्यपाल की मंजूरी के बिना डॉ. अजित कुमार सेठ को परीक्षा नियंत्रक नियुक्त किया गया और एजेंसी के बिलों के भुगतान की मंजूरी उनके स्तर से दी गयी.

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