
जमशेदपुर। आदिवासी समाज की धार्मिक परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को लेकर जमशेदपुर के करनडीह स्थित दिसोम जाहेरथान में 6 सितंबर को कोल्हान स्तरीय धर्म सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। माझी परगना महाल की पारंपरिक व्यवस्था से जुड़े विभिन्न संगठनों की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में कोल्हान प्रमंडल के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की बात कही गई है।
सम्मेलन में देश परगना, परगना, माझी बाबा, नायके बाबा के अलावा शिक्षाविद और समाज के प्रबुद्ध लोग भी हिस्सा लेंगे। आयोजकों का कहना है कि पारंपरिक आदिवासी स्वशासन व्यवस्था की ओर से कोल्हान में इतने व्यापक स्तर पर धर्म सम्मेलन पहली बार आयोजित किया जा रहा है।
सामाजिक और सांस्कृतिक एकजुटता पर रहेगा जोर
सर्किट हाउस में आयोजित प्रेस वार्ता में जुगसलाई तोरोप परगना दशमत हांसदा और धाड़ दिशोम देश पारानिक दुर्गाचरण मुर्मू ने सम्मेलन की रूपरेखा की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बदलते समय में अपनी जड़ों, परंपराओं और धार्मिक पहचान को बचाए रखने के लिए समाज को एकजुट होकर आगे बढ़ने की जरूरत है।
आयोजकों के मुताबिक सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य आदिवासी समाज को सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक स्तर पर जागरूक एवं संगठित करना है।
नई पीढ़ी को बताई जाएगी परंपरा की विरासत
सम्मेलन में खास तौर पर युवाओं को आदिवासी समाज की पारंपरिक जीवन-पद्धति से परिचित कराने पर चर्चा होगी। जन्म से लेकर मृत्यु तक होने वाले सामाजिक संस्कार, पूजा-पद्धति, रीति-रिवाज और पारंपरिक न्याय व्यवस्था की जानकारी नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर दिया जाएगा।
इसके साथ ही संविधान में आदिवासी समुदाय को मिले अधिकारों के प्रति लोगों को जागरूक करने की बात भी आयोजकों ने कही है।
धर्मांतरण के मुद्दे पर भी होगी चर्चा
प्रेस वार्ता के दौरान समाज में धर्मांतरण को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई। आयोजकों ने आरोप लगाया कि विभिन्न प्रकार के प्रलोभनों के जरिए लोगों को प्रभावित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में समाज को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूक रहने की जरूरत है।
हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
धार्मिक स्थलों के संरक्षण का उठेगा मुद्दा
सम्मेलन में आदिवासी समाज के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों के संरक्षण पर भी विचार-विमर्श प्रस्तावित है। आयोजकों ने मरांगबुरू, लुगु बुरु, आजोदिया बुरु और राजरप्पा के जांग बाहा तुपुनाई घाट जैसे स्थलों को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
पारंपरिक परिधान में पहुंचने की अपील
आयोजकों ने कोल्हान के आदिवासी समाज से 6 सितंबर को करनडीह दिसोम जाहेरथान पहुंचकर सम्मेलन में भाग लेने की अपील की है। लोगों से पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होने का आग्रह किया गया है।
आयोजकों के अनुसार, यह आयोजन सिर्फ एक धार्मिक सम्मेलन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आदिवासी समाज की परंपरा, संस्कृति, धार्मिक पहचान और पारंपरिक व्यवस्था को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सामूहिक प्रयास होगा।





