
नई दिल्ली। भारतीय वेटलिफ्टिंग की स्टार खिलाड़ी मीराबाई चानू ने आखिरकार एशियन गेम्स में पदक जीतने का अपना सपना पूरा कर लिया। 23 सितंबर 2026 को जापान में आयोजित प्रतियोगिता में चानू ने महिलाओं के 49 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर मेडल अपने नाम किया। उन्होंने कुल 198 किलोग्राम वजन उठाकर यह उपलब्धि हासिल की।
मीराबाई चानू के लिए यह पदक इसलिए भी खास है, क्योंकि एशियन गेम्स में पदक जीतने का इंतजार वह लंबे समय से कर रही थीं। इससे पहले 2014 में वह पदक से चूक गई थीं, जबकि 2018 में चोट ने उनका रास्ता रोक दिया था। 2023 के एशियन गेम्स में भी उन्हें चौथे स्थान से संतोष करना पड़ा था।
स्नैच में शानदार शुरुआत
मीराबाई ने प्रतियोगिता की शुरुआत स्नैच में शानदार प्रदर्शन के साथ की। उन्होंने क्रमशः 83, 85 और 87 किलोग्राम वजन उठाकर अपने इरादे साफ कर दिए। इसके बाद क्लीन एंड जर्क में उन्होंने 111 किलोग्राम वजन उठाया।
दोनों स्पर्धाओं में कुल 198 किलोग्राम का भार उठाने के साथ मीराबाई ने सिल्वर मेडल पर कब्जा जमाया। इस वर्ग में गोल्ड मेडल उत्तर कोरिया की खिलाड़ी ने जीता।
28 साल बाद भारत को वेटलिफ्टिंग में पदक
मीराबाई चानू की इस उपलब्धि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि एशियन गेम्स की वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में भारत को करीब 28 साल बाद पदक मिला है। इससे पहले 1998 में कर्णम मल्लेश्वरी ने भारत के लिए एशियन गेम्स में वेटलिफ्टिंग पदक जीता था।
अब मीराबाई ने इतिहास में अपना नाम दर्ज कराते हुए इस इंतजार को खत्म कर दिया है।
एशियन गेम्स में तीसरी कोशिश में मिली सफलता
मीराबाई चानू का एशियन गेम्स सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 2014 में उन्होंने पहली बार इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था, लेकिन पदक नहीं जीत सकीं। इसके बाद 2018 में चोट के कारण उन्हें प्रतियोगिता से बाहर रहना पड़ा। 2023 में उन्होंने वापसी की, लेकिन चौथे स्थान पर रहने के कारण पदक से महज एक कदम दूर रह गईं।
अब 2026 में चानू ने शानदार प्रदर्शन करते हुए आखिरकार एशियन गेम्स का पदक अपने नाम कर लिया।
ओलंपिक से कॉमनवेल्थ तक चमकता रहा है करियर
मीराबाई चानू का यह पहला एशियन गेम्स पदक जरूर है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी उपलब्धियों की लंबी सूची है। वह टोक्यो ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीत चुकी हैं। इसके अलावा कॉमनवेल्थ गेम्स और विश्व स्तर की प्रतियोगिताओं में भी उन्होंने भारत का गौरव बढ़ाया है।
एशियन गेम्स का सिल्वर उनके करियर की उपलब्धियों में एक और बड़ा अध्याय जोड़ता है। वर्षों के इंतजार और लगातार संघर्ष के बाद मीराबाई ने आखिरकार वह मुकाम हासिल कर लिया, जिसका सपना उन्होंने काफी पहले देखा था।






