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आदिवासी सेंगेल अभियान ने देश के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी शहीद तिलका मुर्मू को जयंती पर किया नमन

On: February 11, 2026 4:52 PM
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जमशेदपुर:आदिवासी सेंगेल अभियान की ओर से प्रखंड के सालतोला पंचायत के अंतर्गत पारपलसा में देश के प्रथम स्वतंत्र सेनानी महान् वीर शहीद तिलका मुर्मू का 276 वां जयंती मनाया गया। समारोह की शुरुआत तिलका मुर्मू के चित्र पर माल्यार्पण ओर फूल देकर किया गया। मौके पर उपस्थित आदिवासी सेंगेल अभियान के दुमका जोनल हेड बार्नाड हांसदा ने कहा कि मांझी बाबा तिलका मुर्मू ही भारत के प्रथम स्वतंत्र सेनानी थे। तिलका मुर्मू संताल थे या पहाड़िया इसे लेकर विवाद है। आम तौर पर तिलका मुर्मू टोटेल का बताते हुए अनेक लेखकों ने उन्हें संताल आदिवासी बताया है। तिलका मुर्मू के पिता का नाम सुंदरा मुर्मू और माता का पानो मुर्मू थे। सुंदरा मुर्मू तिलकपुर गांव के ग्राम प्रधान ( मांझी बाबा ) थे उनके माता और पिता के नाम से साफ पता चलता है तिलका मुर्मू संताल परिवार में जन्मे एक संताल आदिवासी समुदाय के थे । तिलका मुर्मू का जन्म 11 फरवरी 1750 को हुआ।

उन्होंने 1779ई० में ही अंग्रेज़ों से जल जंगल जमीन बचाने और अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया था। उनके नेतृत्व में सुल्तान गंज, भागलपुर,चंपा झरना,सौतन जंगल इत्यादि क्षेत्रों में अंग्रेजी सेनाओं के साथ मुठभेड़ हुआ था। जिसमें अंग्रेजी हुकूमत को पराजित किया था। तिलका मुर्मू बीहाड़ जंगलों में रह कर अपनी सेनाओं को प्रशिक्षण देते थे। उन्होंने 1784 में क्रूरुर अंग्रेज कलेक्टर क्लीवलैंड को अपने धनुष – तीर से मार गिरा कर मौत के घाट उतारा था। बाद में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें चार घोड़ों में बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाया गया था। पर मिलों घसीटे जाने के बावजूद वह संताल लड़का जीवित था। खून में डूबी उसकी देह तब भी गुस्सैल थी और उसकी लाल – लाल आंखे ब्रितानी राज को डरा रही थी। भय से कांपते हुए अंग्रेजों ने तब भागलपुर के चौराहे पर स्थित एक विशाल पीपल के पेड़ पर फांसी का सजा दिया था। हजारों की भीड़ के सामने तिलका मुर्मू हंसते – हंसते फासी पर झूल गए थे । अभी भी बिहार के भागलपुर जिले में तिलका मुर्मू के नाम से तिलका मुर्मू विश्व विद्यालय अवस्थित है तथा भागलपुर का मुख्य बाजार भी तिलका मुर्मू हाट के नाम से जाना जाता है। लेकिन अफसोस की बात है कि भारत देश आजाद हो चुका है और आज भी हम आदिवासियों का जल, जंगल, जमीन, भाषा – संस्कृति, सरना धर्म,मरांग बुरु,लुगुबुरू, एसटी जुड़ू, नौकरी इज्जत, आबादी आदि लूटा जा रहा है।किसी भी आदिवासी संसद, विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री, बुद्धिजीवी,समाजिक संगठन के अगुवा आदि ने भी आदिवासी समाज बचाने का बात नहीं किया। सिर्फ आदिवासी सेंगेल अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व संसाद सालखन मुर्मू ने ही भारत के सात प्रदेश बिहार बंगाल असम उड़ीसा झारखंड त्रिपुरा अरुणाचल प्रदेश तथा नेपाल भूटान और बंगला देश में भी संगठन खड़ा कर आदिवासियों को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्ही के नेतृत्व में प्राकृति पूजक आदिवासियों के लिए सरना धर्म कोड, मरांग बुरु, लुगुबुरू बचाओ, राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सबसे बड़ी आदिवासी भाषा संताली को आदिवासी बहुल प्रदेश झारखंड में प्रथम राजभाषा बनाने, सीएनटी एसपीटी कानून को बचाने, झारखण्डी डोमिसाइल नीति बनाने आदि की लड़ाई जारी है।

आगे उन्होंने कहा जब तक आदिवासी समाज में समाज सुधार कर नशापान और अंधविश्वास को खत्म नहीं किया जाएगा तब तक आदिवासी समाज नहीं बचेगा। इसके लिए आदिवासी समाज में भी संविधान कानून और जनतंत्र को लागू कर गांव में सभी महिला पुरुष मिल कर मांझी बाबा का चुनाव करना होगा।
मौके पर लोगेन सोरेन, सुनील हांसदा, हेमंत हांसदा, जुलियस हांसदा, फ़िलिमन सोरेन , जोलहा सोरेन, लिखाई हांसदा, अमीन हांसदा, डॉक्टर सोरेन, फूल मरांडी आदि मौजूद थे।

Satish Sinha

मैं सतीश सिन्हा, बीते 38 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हूँ। इस दौरान मैंने कई अखबारों और समाचार चैनलों में रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए न केवल खबरों को पाठकों और दर्शकों तक पहुँचाने का कार्य किया, बल्कि समाज की समस्याओं, आम जनता की आवाज़ और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की वास्तविक तस्वीर को इमानदारी से उजागर करने का प्रयास भी निरंतर करता रहा हूँ। पिछले तकरीबन 6 वर्षों से मैं 'झारखंड वार्ता' से जुड़ा हूँ और क्षेत्रीय से जिले की हर छोटी-बड़ी घटनाओं की सटीक व निष्पक्ष रिपोर्टिंग के माध्यम से पत्रकारिता को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का प्रयास कर रहा हूँ।

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