नई दिल्ली: पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoK) में सक्रिय आतंकी संगठनों ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। ये संगठन नई रणनीति के तहत बच्चों को निशाना बना रहे हैं ताकि लंबे समय तक अपना प्रभाव बनाए रखा जा सके। आतंकी संगठन अब सीधे स्कूलों और बच्चों तक पहुंच बनाने में जुट गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जैश-ए-मोहम्मद (JeM) और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) जैसे संगठन नई पीढ़ी को निशाना बनाकर भविष्य के आतंकियों की फौज तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।
पोस्टर और विज्ञापनों के जरिए बच्चों की भर्ती
रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान के कई बड़े शहरों और PoK के इलाकों में पोस्टर और प्रचार सामग्री के जरिए अभिभावकों से अपील की जा रही है कि वे 7 से 13 वर्ष के बच्चों को इन संगठनों से जुड़े संस्थानों में दाखिला दिलाएं। इन तथाकथित स्कूलों में मुफ्त शिक्षा, भोजन और मासिक भत्ता देने का लालच दिया जा रहा है, जिससे खासकर गरीब परिवारों को आकर्षित किया जा सके।
कट्टरपंथी सोच का प्रशिक्षण
इन संस्थानों में सामान्य शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित करने का भी प्रयास किया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि यहां जिहादी सोच को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रशिक्षण और गतिविधियां कराई जाती हैं। इतना ही नहीं, आतंकी संगठनों के सदस्य PoK के सरकारी और निजी स्कूलों में जाकर भाषण दे रहे हैं और छात्रों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।
स्कूलों में ‘आतंकी नैरेटिव’ को बढ़ावा
रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि स्कूलों में कॉस्ट्यूम प्रतियोगिता, नाटक और अन्य गतिविधियों के जरिए आतंकवाद से जुड़े विषयों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इन कार्यक्रमों में कश्मीर में मारे गए आतंकियों को हीरो की तरह पेश किया जाता है और कथित उत्पीड़न की कहानियों के माध्यम से बच्चों के मन में कट्टरता भरी जाती है।
स्कूल परिसरों से बाहर भी चल रहे कार्यक्रम
सिर्फ स्कूल ही नहीं, बल्कि स्कूल परिसरों के बाहर भी बच्चों और युवाओं के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इनका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को बेहतर भविष्य का सपना दिखाकर अपने नेटवर्क में शामिल करना है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई अभिभावक अपने बच्चों को मौजूदा स्कूलों से निकालकर जिहादी संस्थानों में भेज रहे हैं।
पाकिस्तान के संरक्षण में पनप रहे आतंकी संगठनों की यह रणनीति बेहद चिंताजनक है। यह न केवल क्षेत्र में शांति और स्थिरता के प्रयासों को कमजोर करती है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी गहरा नुकसान पहुंचाती है। बच्चों के मन में नफरत और हिंसा का जहर भरना लंबे समय में पूरे समाज के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। बच्चों जैसे मासूम और संवेदनशील वर्ग को कट्टरपंथ की ओर धकेलना इस बात का संकेत है कि ये संगठन अपने नापाक मंसूबों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
यह स्थिति भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है, क्योंकि अब आतंकवाद केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मानसिक और वैचारिक स्तर पर भी फैलाया जा रहा है। विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर में अस्थिरता पैदा करने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, जहां बच्चों को बहला-फुसलाकर या जबरन आतंकी नेटवर्क में शामिल किया जा रहा है।













