रांची:झारखंड राज्य के अंगीभूत महाविद्यालयों में दशकों से इंटरमीडिएट और स्नातक की पढ़ाई एक साथ संचालित होती रही है। यह केवल शिक्षा की व्यवस्था नहीं रही, बल्कि पांच दशकों से सैकड़ों शिक्षकों-कर्मचारियों और हजारों परिवारों के जीवन का आधार रही है।
आज वही व्यवस्था अपने अंत की ओर बढ़ रही है और इसके साथ ही सैकड़ों शिक्षकों और कर्मचारियों का भविष्य अंधकार में डूबता नजर आ रहा है।
पांच दशक पुरानी व्यवस्था, आज असहाय
वर्ष 2008 में यूजीसी ने डिग्री कॉलेजों से इंटरमीडिएट की पढ़ाई हटाने का निर्देश दिया था, लेकिन झारखंड में उस समय न पर्याप्त प्लस टू स्कूल थे, न शिक्षक और न ही संसाधन। मजबूरी में यह व्यवस्था चलती रही और इन्हीं महाविद्यालयों ने राज्य के लाखों छात्रों को शिक्षा दी।
फिर आई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020—जिसने इंटरमीडिएट शिक्षा को प्लस टू स्कूलों तक सीमित कर दिया। नीति तो लागू हो गई, लेकिन जिन शिक्षकों और कर्मचारियों ने वर्षों तक कम वेतन, अस्थिर नौकरी और सीमित संसाधनों में भी शिक्षा की मशाल जलाए रखी, उनके भविष्य को लेकर कोई ठोस योजना नहीं बनाई गई।
धरना, वादे और फिर सन्नाटा
पिछले वर्ष जब 11वीं की पढ़ाई बंद की गई, तब प्रभावित शिक्षक-कर्मचारी मजबूरी में सड़कों पर उतरे।
धरने के दौरान तत्कालीन शिक्षा मंत्री स्व. रामदास सोरेन ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से आश्वासन दिया—
“किसी भी शिक्षक या कर्मचारी को बेरोजगार नहीं होने दिया जाएगा।”
इससे पहले शिक्षा मंत्री जगन्नाथ महतो ने भी रोजगार सुरक्षा का भरोसा दिलाया था।
लेकिन आज हकीकत यह है कि आश्वासन देने वाले नेता इस दुनिया में नहीं हैं, और पीछे रह गए हैं सिर्फ सवाल, चिंता और अनिश्चितता।
सरकार की ओर से अब तक न कोई नीति, न कोई समय-सीमा, न कोई स्पष्ट निर्णय सामने आया है।
आने वाले दो महीनों में इंटरमीडिएट शिक्षा पूरी तरह समाप्त होने की आशंका है और उसके साथ ही सैकड़ों परिवारों की रोज़ी-रोटी छिन जाने का खतरा भी।
खाली पद, भरी हुई ज़िंदगियां
यह विडंबना ही है कि जिस शिक्षा विभाग में इन शिक्षकों को हटाया जा रहा है, वहीं सैकड़ों पद वर्षों से खाली पड़े हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार चाहे तो—
विशेष निधि का गठन कर
पुनर्नियोजन नीति लागू कर
या अन्य शैक्षणिक संस्थानों में समायोजन करके
इन अनुभवी शिक्षकों-कर्मचारियों को राज्य के भीतर ही सम्मानजनक रोजगार दे सकती है।
कर्मचारियों का दर्द साफ है—
“हमने जवानी इसी व्यवस्था को दे दी, आज बुढ़ापे में हमसे हमारा सहारा छीना जा रहा है।”
बुद्धिजीवियों के सवाल, सरकार मौन
बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों ने भी सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं—
इंटरमीडिएट संचालन से जुड़े करोड़ों रुपये जो झारखंड अधिविध परिषद के बैंक खातों में जमा हैं, उनका उपयोग और भविष्य क्या है?
आज़ादी के बाद से कॉलेजों में इंटरमीडिएट पढ़ने वाले वे छात्र, जिन्होंने दशकों पहले पढ़ाई की लेकिन आज तक प्रमाण-पत्र नहीं ले पाए, उनका क्या होगा?
वे छात्र जो 11वीं में मार्जिनल रह गए या 12वीं का फॉर्म नहीं भर सके—क्या उनका भविष्य यूं ही अधर में छोड़ दिया जाएगा?
इन तमाम सवालों पर अब तक सरकार की ओर से खामोशी ही देखने को मिल रही है।
जब जानकारी है, तो फैसला क्यों नहीं?
चिंता की बात यह है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रवक्ता कुणाल सारंगी, कई मंत्रियों और विधायकों ने इस गंभीर मुद्दे पर मुख्यमंत्री का ध्यान आकृष्ट कराया है।
मुख्यमंत्री स्वयं इस पूरे विषय से अवगत हैं—तो फिर अब तक कोई ठोस, संवेदनशील और मानवीय निर्णय क्यों नहीं लिया गया?
अब सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं, इंसाफ़ का है
इंटरमीडिएट शिक्षा व्यवस्था का अंत सिर्फ एक शैक्षणिक बदलाव नहीं है—
यह सैकड़ों शिक्षकों-कर्मचारियों के सपनों, बच्चों की पढ़ाई, बुज़ुर्ग माता-पिता की दवाइयों और घर के चूल्हे से जुड़ा सवाल है।
लोगों की एक ही मांग है—
सरकार इस पूरे मुद्दे पर खुलकर, ईमानदारी से और सार्वजनिक रूप से जवाब दे, ताकि शिक्षा सुधार के नाम पर किसी का भविष्य अंधकार में न धकेला जाए।
आज झारखंड के सामने चुनौती सिर्फ नीति लागू करने की नहीं है,
बल्कि इंसानियत, भरोसे और जिम्मेदारी निभाने की भी है।
झारखंड:अंगीभूत महाविद्यालयों में इंटरमीडिएट के सैकड़ों शिक्षकों-कर्मचारियों की रोज़ी-रोटी पर संकट,भविष्य अधर में








