एर्नाकुलम: केरल में एक बार फिर प्रशासनिक पुनर्गठन की मांग ने सियासी और वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है। केरल मुस्लिम जमात नामक संगठन ने राज्य सरकार के समक्ष एर्नाकुलम जिले के बंटवारे की मांग रखी है। संगठन का प्रस्ताव है कि मुवत्तुपुझा को मुख्यालय बनाकर एक नया जिला गठित किया जाए।
संगठन का तर्क है कि एर्नाकुलम जिले की आबादी 34 लाख से अधिक हो चुकी है, ऐसे में प्रशासनिक कामकाज और विकास योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के लिए जिले का विभाजन जरूरी हो गया है। सतही तौर पर देखें तो यह मांग कई अन्य जिलों में हुए प्रशासनिक पुनर्गठन जैसी ही प्रतीत होती है, लेकिन जैसे-जैसे इस मांग के पीछे के आंकड़ों और सामाजिक समीकरणों पर नजर डाली जाती है, सवाल खड़े होने लगते हैं।
जनसंख्या संतुलन बदलने का गणित
वर्तमान एर्नाकुलम जिले में धार्मिक जनसंख्या संरचना की बात करें तो यहां लगभग 46 प्रतिशत हिंदू, 38 प्रतिशत ईसाई और करीब 16 प्रतिशत मुस्लिम आबादी निवास करती है। इस संरचना में कोई एक समुदाय निर्णायक बहुमत में नहीं है, जिससे प्रशासनिक और सामाजिक संतुलन बना रहता है।
लेकिन जिस मुवत्तुपुझा क्षेत्र को नया जिला बनाने की मांग की जा रही है, वहां जनसंख्या का समीकरण काफी अलग है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मुवत्तुपुझा इलाके में मुस्लिम आबादी करीब 40 प्रतिशत, हिंदू लगभग 39 प्रतिशत और ईसाई करीब 21 प्रतिशत हैं। यानी नया जिला बनने की स्थिति में मुस्लिम समुदाय सबसे बड़ा समूह बनकर उभरेगा।
यहीं से इस मांग को लेकर आलोचकों की शंकाएं शुरू होती हैं। उनका कहना है कि प्रशासनिक सुविधा के नाम पर किया जा रहा यह प्रस्ताव दरअसल जनसांख्यिकीय संतुलन को बदलने का प्रयास हो सकता है।
प्रशासनिक नियंत्रण और नीतिगत प्रभाव की आशंका
आलोचकों का तर्क है कि नया जिला बनने के बाद वहां की प्रशासनिक व्यवस्था, स्थानीय नीतियां और निर्णय-प्रक्रिया पर किसी एक वैचारिक धारा का प्रभाव बढ़ सकता है। उनका दावा है कि बहुसंख्यक स्थिति में आने के बाद कट्टरपंथी सोच वाले तत्वों को सिस्टम पर पकड़ मजबूत करने का अवसर मिल सकता है, जिससे नीतियां निष्पक्षता के बजाय धार्मिक झुकाव के आधार पर तय होने लगें।
विभाजन की वैचारिक गूंज?
इस पूरे विवाद में सबसे तीखी प्रतिक्रिया उन लोगों की ओर से आ रही है, जो इस मांग को ऐतिहासिक विभाजन की सोच से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि यह वही वैचारिक प्रवृत्ति है, जिसने कभी धार्मिक आधार पर अलग पहचान और अलग सत्ता की मांग को जन्म दिया था।
आलोचकों का दावा है कि पहले प्रशासनिक सहूलियत के नाम पर जिले की मांग की जाती है, फिर भविष्य में उसी आधार पर अलग राज्य और अंततः अलग राजनीतिक-वैधानिक व्यवस्था की बात उठाई जा सकती है। वे इसे 1947 के विभाजन से जुड़ी उस मानसिकता की आधुनिक अभिव्यक्ति मानते हैं, जिसने देश को धार्मिक आधार पर बांट दिया था।
राज्य सरकार के लिए चुनौती
फिलहाल यह मांग राज्य सरकार के लिए एक संवेदनशील मुद्दा बन गई है। एक ओर प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की जरूरतों को नकारा नहीं जा सकता, वहीं दूसरी ओर किसी भी फैसले से पहले उसके सामाजिक और वैचारिक परिणामों का आकलन करना भी जरूरी है।
एर्नाकुलम जिले के बंटवारे की मांग केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक सवाल भी खड़े कर रही है। यह देखना अहम होगा कि सरकार इस प्रस्ताव को महज जनसंख्या और सुविधा के आधार पर देखती है या फिर इसके दूरगामी प्रभावों पर भी गंभीरता से विचार करती है।











