नई दिल्ली: डीपफेक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार भ्रामक कंटेंट पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार ने अपने टेक कानूनों में अहम संशोधन किए हैं। संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियमों के तहत अब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर एआई-जनरेटेड और डीपफेक कंटेंट को स्पष्ट रूप से लेबल करना अनिवार्य होगा।
सरकार की ओर से 10 फरवरी को अधिसूचित किए गए ये नए नियम 20 फरवरी से प्रभावी होंगे। इनका उद्देश्य डीपफेक, गलत सूचना, प्रतिरूपण (इम्परसनेशन) और सिंथेटिक मीडिया के दुरुपयोग पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना है।
नए नियमों के मुताबिक, एआई टूल्स के जरिए तैयार या बदले गए किसी भी ऑडियो, वीडियो या विजुअल कंटेंट पर साफ और प्रमुख रूप से AI-Generated या AI-Modified का लेबल लगाना होगा। सरकार ने इसे सिंथेटिकली जेनरेटेड इंफॉर्मेशन (SGI) की श्रेणी में औपचारिक रूप से शामिल किया है। यह वह कंटेंट होगा जो देखने या सुनने में पूरी तरह असली जैसा लगे, लेकिन वास्तव में एआई के जरिए तैयार या एडिट किया गया हो और जिसे पहचानना आम यूजर के लिए मुश्किल हो सकता है।
मेटाडाटा और ट्रेसिंग सिस्टम भी अनिवार्य
जहां तकनीकी रूप से संभव होगा, वहां प्लेटफॉर्म्स को एआई-जनरेटेड कंटेंट में स्थायी मेटाडाटा या तकनीकी प्रोवेनेंस मार्कर्स (जैसे यूनिक आइडेंटिफायर) एम्बेड करने होंगे। इससे कंटेंट को उसके मूल स्रोत या प्लेटफॉर्म तक ट्रेस किया जा सकेगा।
सरकार ने साफ किया है कि इन लेबल्स या मेटाडाटा को हटाने, छेड़छाड़ करने या छिपाने की अनुमति नहीं होगी।
यूजर्स को करनी होगी घोषणा
संशोधित नियमों के तहत कंटेंट अपलोड करते समय यूजर्स को यह घोषणा करनी होगी कि उनका पोस्ट किया गया कंटेंट एआई से बनाया गया है या एआई के जरिए बदला गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को इन घोषणाओं की सटीकता जांचने के लिए उचित तकनीकी उपाय अपनाने होंगे, जिनमें ऑटोमेटेड वेरिफिकेशन टूल्स भी शामिल हो सकते हैं। यदि बिना उचित खुलासे के एआई-जनरेटेड कंटेंट प्रकाशित होता है तो उसकी जिम्मेदारी प्लेटफॉर्म्स पर तय की जा सकेगी।
आपत्तिजनक कंटेंट हटाने की समय-सीमा घटी
सरकार ने कंटेंट मॉडरेशन को लेकर भी सख्ती बढ़ा दी है। कुछ श्रेणियों की गैरकानूनी या हानिकारक सामग्री को अब 36 घंटे की बजाय सिर्फ तीन घंटे के भीतर हटाना होगा। इसके अलावा 15 दिन की समय-सीमा घटाकर 7 दिन और 24 घंटे की समय-सीमा घटाकर 12 घंटे कर दी गई है, जो उल्लंघन की गंभीरता पर निर्भर करेगी।
अवैध गतिविधियों में इस्तेमाल एआई कंटेंट भी अपराध
नियमों में स्पष्ट किया गया है कि गैरकानूनी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया गया एआई-जनरेटेड कंटेंट किसी भी अन्य अवैध कंटेंट की तरह ही माना जाएगा। प्लेटफॉर्म्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी सेवाओं का इस्तेमाल बाल यौन शोषण सामग्री, अश्लील या आपत्तिजनक पोस्ट, फर्जी पहचान, नकली इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, या हथियारों और विस्फोटकों से जुड़े सिंथेटिक कंटेंट के निर्माण या प्रसार के लिए न हो।
सेफ हार्बर को लेकर राहत
हालांकि, सरकार ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को सेफ हार्बर सुरक्षा को लेकर आश्वस्त भी किया है। अधिसूचना में कहा गया है कि यदि इंटरमीडियरी नियमों का पालन करते हुए एआई-जनरेटेड या सिंथेटिक कंटेंट को हटाते हैं या उस तक पहुंच सीमित करते हैं, चाहे वह ऑटोमेटेड टूल्स के जरिए ही क्यों न हो, तो उन्हें आईटी एक्ट की धारा 79 के तहत मिलने वाली सुरक्षा से वंचित नहीं किया जाएगा।
सरकार के अनुसार, डीपफेक और सिंथेटिक मीडिया के जरिए धोखाधड़ी, उत्पीड़न, गलत सूचना फैलाने और प्रतिरूपण जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। इन्हीं बढ़ती चिंताओं को देखते हुए यह सख्त कदम उठाया गया है, ताकि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पारदर्शिता बढ़े और यूजर्स को गुमराह होने से बचाया जा सके।













