नई दिल्ली: जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मुख्यालय में आयोजित एक विशेष सत्र में संगठन के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने देश के मौजूदा सामाजिक माहौल, बढ़ती विभाजनकारी राजनीति और संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने देश की एकता व न्याय की रक्षा के लिए जिम्मेदार नेतृत्व, आपसी सद्भाव और संविधान की भावना को सर्वोपरि रखने की जरूरत पर जोर दिया।
धर्म के आधार पर बांटना देश को कमजोर करता है : अरशद मदनी
अपने संबोधन में मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि देश आज एक अत्यंत संवेदनशील दौर से गुजर रहा है और नफरत फैलाने वाली राजनीति समाज की जड़ों को कमजोर कर रही है। उन्होंने कहा, “धर्म के आधार पर लोगों को बांटना देश को कमजोर करता है। कुछ सांप्रदायिक ताकतें इस्लाम और मुसलमानों को निशाना बना रही हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि इस्लाम का यह दीया कभी बुझने वाला नहीं है।”
मदनी ने सामाजिक सौहार्द बनाए रखने और संविधान की मूल भावना की रक्षा को देशहित के लिए आवश्यक बताया।
अल-फलाह यूनिवर्सिटी पर कार्रवाई को लेकर उठाए सवाल
अरशद मदनी ने अल-फलाह यूनिवर्सिटी के संस्थापक जावेद अहमद सिद्दीकी की गिरफ्तारी पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि मुस्लिम नेतृत्व को लगातार संदेह की नजर से देखा जा रहा है। उन्होंने कहा, “न्यूयॉर्क का मेयर मुस्लिम (ममदानी) बन सकता है, लंदन का मेयर खान बन सकता है, लेकिन यहां एक मुस्लिम वाइस चांसलर बनने पर भी उसे संदेह की नजर से देखा जाता है। आजम खान से लेकर जावेद सिद्दीकी तक सभी को निशाना बनाया गया।”
गौरतलब है कि हाल ही में दिल्ली ब्लास्ट मामले में अल-फलाह यूनिवर्सिटी का नाम सामने आने के बाद विश्वविद्यालय से जुड़े कई लोगों की जांच की जा रही है। जांच एजेंसियों के अनुसार आई-20 कार ब्लास्ट मामले के आरोपी उमर के संबंध भी इसी यूनिवर्सिटी से जुड़े बताए गए हैं।
मुसलमानों में नेतृत्व की कमी की बात करना गलत : मदनी
अरशद मदनी ने कहा कि समाज में यह गलत धारणा बनाई जा रही है कि मुसलमान नेतृत्व क्षमता से वंचित हैं।
उन्होंने कहा, “कहते हैं मुसलमानों में लीडरशिप क्वालिटी नहीं है। मुसलमान कोई बांझ कौम नहीं है। दुनिया भर में जहां अवसर मिलता है, वहां मुस्लिम नेतृत्व उभरता है।”
महमूद मदनी ने बंटवारे के इतिहास और उलेमा की भूमिका का किया जिक्र
सत्र के दौरान जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष (दूसरे धड़े) मौलाना महमूद मदनी ने देश के बंटवारे के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष की बात भी उठाई। उन्होंने कहा कि मौलाना किफायतुल्लाह, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे विद्वानों ने विभाजन का विरोध किया था, लेकिन उनकी आवाज को उस समय अनसुना कर दिया गया।
महमूद मदनी ने कहा, “अगर उस वक़्त उलेमा और जिम्मेदार लोग एकजुट रहते, तो शायद देश का नक्शा और इतिहास आज अलग होता।”
समापन में दोनों नेताओं का संदेश
सत्र के अंत में मौलाना अरशद मदनी और मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि देश की एकता, भाईचारे और लोकतांत्रिक ढांचे की रक्षा के लिए सभी नागरिकों को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को संविधान, न्याय और समानता के मूल्यों को समझकर आगे बढ़ना चाहिए।
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