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झारखंड के ये 2 मंदिर समेत 3 ऐसे धाम, जहां से प्रसाद घर ले जाना है मना; जानें रहस्यमयी वजह

On: January 2, 2026 7:17 PM
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एजेंसी: हिंदू धर्म में मंदिरों का प्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। भगवान को अर्पित किया गया प्रसाद भक्तों के लिए ईश्वरीय कृपा का स्वरूप होता है, जिसे ग्रहण कर लोग मानसिक शांति और संतोष का अनुभव करते हैं।


हालांकि, देश के कुछ ऐसे मंदिर भी हैं, जहां प्रसाद से जुड़ी विशेष मान्यताएं और नियम हैं। मान्यता है कि इन मंदिरों से प्रसाद को घर ले जाना वर्जित है और नियमों की अनदेखी करने पर अनिष्ट हो सकता है। आइए जानते हैं ऐसे ही तीन प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में, जहां से प्रसाद घर ले जाने की मनाही है।


1. मेहंदीपुर बालाजी मंदिर, राजस्थान


राजस्थान के दौसा जिले में स्थित मेहंदीपुर बालाजी मंदिर देशभर में अपनी विशेष धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां भगवान हनुमान बाल रूप में विराजमान हैं, जिन्हें बालाजी कहा जाता है।


इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को नकारात्मक शक्तियों और बाधाओं से मुक्ति मिलती है। मंदिर में बनने वाला प्रसाद पूरी तरह विशेष विधि से तैयार किया जाता है।


महत्वपूर्ण नियम

प्रसाद न तो खाया जाता है, न ही बांटा जाता है और न ही घर ले जाया जाता हैश्रद्धालु केवल प्रसाद को भगवान को अर्पित कर सकते हैं। मंदिर परिसर से किसी भी प्रकार की खाने-पीने या सुगंधित वस्तु को बाहर ले जाना सख्त मना है।


2. सोनापहरी मंदिर, गिरिडीह (झारखंड)


झारखंड के गिरिडीह जिले के बगोदर क्षेत्र में स्थित सोनापहरी मंदिर लगभग 100 वर्ष पुराना बताया जाता है। स्थानीय लोगों में इस मंदिर को लेकर गहरी आस्था है। यहां चढ़ाए जाने वाले प्रसाद को लेकर मान्यता है कि भक्त इसे मंदिर परिसर में ही ग्रहण कर सकते हैं, लेकिन घर ले जाना निषिद्ध है।


मान्यता के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति भूलवश भी प्रसाद को अपने साथ घर ले जाता है, तो उसे रास्ते में ही किसी दुर्घटना या परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इसी कारण श्रद्धालु नियमों का सख्ती से पालन करते हैं।


3. खुट्टा बाबा मंदिर, ऊर्दाना (झारखंड)


झारखंड के ऊर्दाना क्षेत्र में स्थित खुट्टा बाबा मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है। इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाता है।
यहां भी प्रसाद को लेकर सख्त नियम हैं। मान्यता है कि मंदिर में चढ़ाया गया प्रसाद भक्त अपने घर नहीं ले जा सकते।


स्थानीय श्रद्धालुओं का विश्वास है कि नियमों का उल्लंघन करने से अशुभ परिणाम हो सकते हैं, इसलिए लोग पूरी श्रद्धा के साथ परंपराओं का पालन करते हैं।


धार्मिक मान्यताओं का सम्मान जरूरी


प्रसाद का महत्व केवल उसके स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भक्त और भगवान के बीच आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक होता है। हर मंदिर की अपनी परंपराएं, नियम और मान्यताएं होती हैं, जिनका सम्मान करना श्रद्धालुओं का कर्तव्य माना जाता है।
जहां जिस प्रकार की धार्मिक अनुशंसा की जाती है, उसे उसी रूप में स्वीकार करना ही आस्था की सच्ची पहचान है। यही कारण है कि इन मंदिरों में प्रसाद से जुड़े नियमों का पालन श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है।

Vishwajeet

मेरा नाम विश्वजीत कुमार है। मैं वर्तमान में झारखंड वार्ता (समाचार संस्था) में कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हूं। समाचार लेखन, फीचर स्टोरी और डिजिटल कंटेंट तैयार करने में मेरी विशेष रुचि है। सटीक, सरल और प्रभावी भाषा में जानकारी प्रस्तुत करना मेरी ताकत है। समाज, राजनीति, खेल और समसामयिक मुद्दों पर लेखन मेरा पसंदीदा क्षेत्र है। मैं हमेशा तथ्यों पर आधारित और पाठकों के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूं। नए विषयों को सीखना और उन्हें रचनात्मक अंदाज में पेश करना मेरी कार्यशैली है। पत्रकारिता के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करता हूं।

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