---Advertisement---

शीर्ष माओवादी नेता शुक्रू ने डाले हथियार, 55 लाख का था इनामी; सरेंडर करने वाले साथियों को उतारा था मौत के घाट

On: March 24, 2026 8:59 PM
---Advertisement---

भुवनेश्वर: ओडिशा में चल रहे नक्सल विरोधी अभियानों के बीच एक बड़ी सफलता हासिल हुई है। राज्य के सबसे वांछित माओवादी नेताओं में से एक, कोसा सोड़ी उर्फ शुक्रू ने मंगलवार को कंधमाल जिले में सुरक्षा बलों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उसके साथ चार अन्य माओवादियों ने भी हथियार डाल दिए, जो राज्य में वामपंथी उग्रवाद पर लगाम लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

इस घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए एंटी-नक्सल अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक संजीब पांडा ने बताया कि शुक्रू लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर था, क्योंकि कंधमाल और आसपास के इलाकों में उसकी गहरी संलिप्तता थी। उस पर 55 लाख रुपये का इनाम घोषित था और वह माओवादी संगठन की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता था। उसने एक AK-47 राइफल के साथ आत्मसमर्पण किया। उसका सरेंडर क्षेत्र में लगातार चल रहे सुरक्षा अभियानों की बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

देशभर में माओवादी आंदोलन को हाल के समय में कई झटके लगे हैं, जिनमें कई शीर्ष नेताओं की मौत और आत्मसमर्पण शामिल हैं। ओडिशा में पुलिस सूत्रों के अनुसार, शुक्रू पहले अपने साथियों को आत्मसमर्पण करने से रोकने की कोशिश करता था। हाल ही में उसने अन्वेष उर्फ रेनू नामक 31 वर्षीय माओवादी को मार दिया था, जो डिविजनल कमेटी सदस्य और कालाहांडी-कंधमाल-बौध-नयागढ़ (KKBN) डिवीजन का सैन्य प्लाटून कमांडर था। बताया जाता है कि अन्वेष 12 अन्य साथियों के साथ आत्मसमर्पण की योजना बना रहा था।

सूत्रों के अनुसार, कंधमाल जिले में सुरक्षा बलों के सघन अभियान और अपनी जान के खतरे के कारण शुक्रू को आखिरकार आत्मसमर्पण का फैसला लेना पड़ा। सुरक्षा बलों ने उसे और उसके साथियों के ठिकानों का पता लगाने के लिए ड्रोन का भी इस्तेमाल किया। यह अभियान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा देश को 31 मार्च तक नक्सल मुक्त बनाने के लक्ष्य के तहत चलाया जा रहा है।

शुक्रू की पत्नी अरुणा उर्फ रुक्मिणी उर्फ फूलमती, जो छत्तीसगढ़ की रहने वाली थी, 2020 में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारी गई थी। उस मुठभेड़ के दौरान शुक्रू भी मौजूद था, जो सिरला इलाके में हुई थी। उस समय केंद्रीय समिति के सदस्य मोडेम बालकृष्ण भी उसके साथ था। हालांकि पांच माओवादी मारे गए थे, लेकिन शुक्रू और बालकृष्ण वहां से भागने में सफल रहे थे।

इसके बाद शुक्रू ने अपना ठिकाना बीजीएन (बंसाधारा-घुमुसर-नागाबली) डिवीजन से बदलकर केकेबीएन क्षेत्र में कर लिया और बाद में बौध-कंधमाल इलाके में सक्रिय रहा। उसे झारखंड के लिए कॉरिडोर खोलने की जिम्मेदारी भी दी गई थी। पिछले कुछ वर्षों से वह कंधमाल जिले के दरिंगबाड़ी-राइकीय-चकापाड़ा क्षेत्र में सक्रिय था और करीब 15 माओवादियों के समूह का नेतृत्व कर रहा था, जिनमें अधिकतर छत्तीसगढ़ के थे। कंधमाल को ओडिशा का अंतिम माओवादी गढ़ माना जाता है।

यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने राज्य विधानसभा में बताया कि ओडिशा में माओवादियों की मौजूदगी काफी कम हो गई है और अब केवल लगभग 15 सक्रिय कैडर ही बचे हैं। उन्होंने कहा कि बचे हुए उग्रवादी मुख्य रूप से कंधमाल, कालाहांडी और रायगढ़ा जिलों के जंगलों के त्रि-जंक्शन क्षेत्र तक सीमित हैं, जबकि राज्य के अन्य हिस्सों में हाल में कोई गतिविधि दर्ज नहीं की गई है।

मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि 15 मार्च तक 96 माओवादी और मिलिशिया सदस्य आत्मसमर्पण कर चुके हैं, जिसका श्रेय कड़े सुरक्षा अभियानों और प्रभावी पुनर्वास नीतियों को जाता है। हालांकि, प्रगति के बावजूद कंधमाल को उसकी भौगोलिक चुनौतियों और रणनीतिक महत्व के कारण अब भी नक्सल प्रभावित जिला माना जाता है।

Vishwajeet

मेरा नाम विश्वजीत कुमार है। मैं वर्तमान में झारखंड वार्ता (समाचार संस्था) में कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हूं। समाचार लेखन, फीचर स्टोरी और डिजिटल कंटेंट तैयार करने में मेरी विशेष रुचि है। सटीक, सरल और प्रभावी भाषा में जानकारी प्रस्तुत करना मेरी ताकत है। समाज, राजनीति, खेल और समसामयिक मुद्दों पर लेखन मेरा पसंदीदा क्षेत्र है। मैं हमेशा तथ्यों पर आधारित और पाठकों के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूं। नए विषयों को सीखना और उन्हें रचनात्मक अंदाज में पेश करना मेरी कार्यशैली है। पत्रकारिता के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करता हूं।

Join WhatsApp

Join Now