इस्लामाबाद: पाकिस्तान और चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में बड़ा झटका लगा है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और उसके सुसाइड विंग मजीद ब्रिगेड को 1267 प्रतिबंध व्यवस्था के तहत सूचीबद्ध करने के प्रयास को अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने रोक दिया है। पश्चिमी शक्तियों का कहना है कि पाकिस्तान और चीन इन संगठनों के अल-कायदा या आईएसआईएस से सीधे संबंध साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं दे पाए हैं।
अमेरिका का राजनीतिक संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह रुख इस्लामाबाद और बीजिंग दोनों के लिए कड़ा राजनीतिक संदेश है। गौरतलब है कि वाशिंगटन ने हाल ही में बीएलए और मजीद ब्रिगेड को अपनी राष्ट्रीय सूची में विदेशी आतंकवादी संगठनों के रूप में नामित किया था। उस समय इसे एक संतुलनकारी कदम माना गया था क्योंकि अमेरिका ने साथ ही कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले के जिम्मेदार ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ को लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा संगठन करार दिया था।
इसी कदम से उत्साहित होकर पाकिस्तान ने चीन के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र में बीएलए को प्रतिबंधित सूची में डालने की कवायद शुरू कर दी थी। लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगियों की तकनीकी रोक ने पाकिस्तान की कोशिशों पर पानी फेर दिया।
चीन की रणनीति पर पलटवार
यहां यह बात खास है कि अमेरिका ने वही हथकंडा अपनाया है जिसे चीन अक्सर पाकिस्तान स्थित आतंकियों के खिलाफ भारत और पश्चिमी देशों की कार्रवाई रोकने के लिए इस्तेमाल करता रहा है। उदाहरण के लिए लश्कर-ए-तैयबा के साजिद मीर, शाहिद महमूद और तल्हा सईद जैसे कई आतंकी अब भी चीनी रोक के कारण 1267 प्रतिबंध सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं।
बीएलए का इतिहास और ताकत
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) बलूचिस्तान का सबसे बड़ा सशस्त्र संगठन माना जाता है। इसकी स्थापना वर्ष 2000 में बलूच युवाओं ने खुद को मजबूत करने के मकसद से की थी। संगठन के पास 6,000 से ज्यादा लड़ाके हैं जो हाई-टेक हथियारों से लैस बताए जाते हैं। पाकिस्तान सरकार ने 2006 से इस पर बैन लगा रखा है।
बलूचों का आरोप है कि पाकिस्तान और चीन उनके खनिज संसाधनों का दोहन कर अपनी तिजोरी भर रहे हैं, जबकि स्थानीय लोग गरीबी और उपेक्षा के शिकार हैं। इसी असंतोष ने बीएलए को पाकिस्तान और चीन दोनों के खिलाफ खड़ा कर दिया है।
बलूचिस्तान की आजादी की कहानी
इतिहास पर नजर डालें तो ब्रिटिश शासन के समय बलूचिस्तान सीधा ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं था। इसमें कलात, खारान, लॉस बुरा और मकरान जैसी रियासतें थीं। 1947 में स्वतंत्रता के समय इन रियासतों को भारत, पाकिस्तान या स्वतंत्र राष्ट्र बनने का विकल्प दिया गया था।
बलूचिस्तान ने स्वतंत्र रहने का फैसला किया और मुस्लिम लीग के साथ एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर भी हुए, जिसमें कलात की अलग पहचान को मान्यता दी गई थी। 1947 में बलूचिस्तान ने अपनी आजादी की घोषणा कर दी थी। लेकिन, 1948 में पाकिस्तानी सेना ने सैन्य अभियान चलाकर कलात समेत पूरे बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया। तब से बलूच अलगाववादियों और पाकिस्तान के बीच संघर्ष जारी है।
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की रोक ने साफ कर दिया है कि बीएलए के मुद्दे पर पाकिस्तान और चीन की दलीलें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नहीं हैं। यह न केवल इस्लामाबाद के लिए कूटनीतिक झटका है बल्कि बीजिंग के लिए भी चिंता की बात है, क्योंकि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) प्रोजेक्ट बलूच विद्रोहियों के निशाने पर रहता है।
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