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4 महीने से वेतन अटका,MGM अस्पताल के 135 होमगार्ड आर्थिक संकट में,एक महिला होमगार्ड ने रो रो कर सुनाई आप बीती

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जमशेदपुर: महात्मा गांधी मेमोरियल (एमजीएम) मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे 135 होमगार्ड जवान पिछले चार महीनों से मानदेय का इंतजार कर रहे हैं। वेतन भुगतान में लगातार हो रही देरी के कारण जवानों और उनके परिवारों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। रोजमर्रा का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और इलाज जैसी जरूरी जरूरतें भी पूरी करना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है।
बीते कुछ दिनों में सामने आई दो घटनाओं ने इस समस्या की गंभीरता को उजागर कर दिया है। पहली घटना 8 जुलाई की है, जब ड्यूटी पर तैनात महिला होमगार्ड जवान अलादीन महाली ने कथित तौर पर आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव से परेशान होकर परिसर में रखी फिनाइल पी ली। साथी जवानों की तत्परता से उन्हें तत्काल अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के बाद उनकी जान बच गई। उन्होंने बताया कि लंबे समय से वेतन नहीं मिलने के कारण घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई है। बीमार मां का इलाज, बेटे की स्कूल फीस और घरेलू खर्च चलाना उनके लिए असंभव होता जा रहा था।
इसी बीच शनिवार सुबह एक और महिला होमगार्ड जवान फुलकुमारी हेम्ब्रम की पीड़ा भी अस्पताल परिसर में सबके सामने छलक पड़ी। वह रोते हुए अपनी आर्थिक मजबूरी बताने लगीं। उनका कहना था कि चार महीने से मानदेय नहीं मिलने के कारण परिवार का गुजारा करना कठिन हो गया है। स्वयं गंभीर बीमारी से जूझ रही फुलकुमारी के पास इलाज और दवा खरीदने तक के पैसे नहीं हैं। उन्होंने प्रशासन से जल्द भुगतान कराने की गुहार लगाई।
पहली घटना के बाद एमजीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय कुमार ने पीड़ित महिला जवान से मुलाकात कर उनका हालचाल जाना और तत्काल व्यक्तिगत आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई। उन्होंने बताया कि लंबित वेतन के भुगतान के लिए संबंधित विभाग को पहले ही पत्र भेजा जा चुका है, लेकिन अब तक मुख्यालय से बजट आवंटित नहीं हुआ है। जैसे ही राशि उपलब्ध होगी, सभी 135 होमगार्ड जवानों का बकाया मानदेय प्राथमिकता के आधार पर जारी कर दिया जाएगा।
लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अस्पताल की सुरक्षा में दिन-रात तैनात रहने वाले होमगार्ड जवानों को समय पर उनका मानदेय कब मिलेगा और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए क्या स्थायी व्यवस्था की जाएगी।

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Satish Sinha

मैं सतीश सिन्हा, बीते 38 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हूँ। इस दौरान मैंने कई अखबारों और समाचार चैनलों में रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए न केवल खबरों को पाठकों और दर्शकों तक पहुँचाने का कार्य किया, बल्कि समाज की समस्याओं, आम जनता की आवाज़ और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की वास्तविक तस्वीर को इमानदारी से उजागर करने का प्रयास भी निरंतर करता रहा हूँ। पिछले तकरीबन 6 वर्षों से मैं 'झारखंड वार्ता' से जुड़ा हूँ और क्षेत्रीय से जिले की हर छोटी-बड़ी घटनाओं की सटीक व निष्पक्ष रिपोर्टिंग के माध्यम से पत्रकारिता को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का प्रयास कर रहा हूँ।