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रांची: झारखंड में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति को लेकर हेमंत सोरेन सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट में पेश न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि झारखंड कैडर की IPS अधिकारी तदाशा मिश्रा को 30 दिसंबर 2025 को राज्य का DGP नियुक्त किया जाना सुप्रीम कोर्ट के उन स्पष्ट निर्देशों के विपरीत था, जिनके तहत DGP पद पर नियुक्ति के समय संबंधित अधिकारी की कम से कम छह महीने की सेवा शेष होना जरूरी है।
वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र राजू रामचंद्रन ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने नोट में तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें उनकी सेवानिवृत्ति से महज एक दिन पहले राज्य का पुलिस प्रमुख नियुक्त किया गया। उनके मुताबिक, यह सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले (2006) में दिए गए फैसलों और बाद के आदेशों में निर्धारित सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है।
CJI सूर्यकांत की पीठ कर रही मामले की सुनवाई
यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ के सामने है। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं। अदालत विभिन्न राज्यों में DGP की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के कथित उल्लंघन से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
18 अगस्त को सुनवाई के दौरान पीठ ने पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की ओर से दाखिल याचिका पर न्यायमित्र को विस्तृत नोट दाखिल करने का निर्देश दिया था। मरांडी ने अपनी याचिका में झारखंड सरकार की ओर से DGP की नियुक्ति को लेकर बनाए गए संशोधित नियमों को सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के विपरीत घोषित करने की मांग की है।
सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले मिली DGP की जिम्मेदारी
तदाशा मिश्रा झारखंड कैडर की 1994 बैच की IPS अधिकारी हैं। राज्य सरकार ने 30 दिसंबर 2025 को उन्हें झारखंड का DGP नियुक्त किया था। खास बात यह थी कि उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख अगले ही दिन यानी 31 दिसंबर 2025 थी। यानी नियुक्ति के समय उनके पास नियमित सेवा का केवल एक दिन बचा था। इसके बावजूद DGP पद पर उनकी नियुक्ति की गई और उन्हें दो वर्ष का कार्यकाल मिला।
यही बिंदु अब विवाद का प्रमुख आधार बन गया है। न्यायमित्र ने अदालत के समक्ष कहा है कि किसी अधिकारी को DGP नियुक्त करते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उसकी कम से कम छह महीने की सेवा बाकी हो। ऐसे में सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले किसी अधिकारी की नियुक्ति इस कसौटी पर सवाल खड़े करती है।
‘प्रकाश सिंह’ फैसले का दिया गया हवाला
न्यायमित्र राजू रामचंद्रन ने अपने नोट में सुप्रीम कोर्ट के ‘प्रकाश सिंह’ मामले का हवाला दिया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान DGP (HoPF) की नियुक्ति उनकी सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले किया जाना इन फैसलों में निर्धारित सिद्धांतों का “स्पष्ट रूप से पूर्ण उल्लंघन” है।
प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस व्यवस्था में राजनीतिक हस्तक्षेप कम करने और पुलिस नेतृत्व में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। इन निर्देशों के तहत DGP के चयन में वरिष्ठता, सेवा रिकॉर्ड और पुलिस बल का नेतृत्व करने की क्षमता जैसे मानकों को महत्व दिया जाना है। साथ ही, DGP को न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल देने की व्यवस्था भी की गई थी।
DGP को दो साल का कार्यकाल देने का प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार राज्य के DGP का चयन राज्य सरकार द्वारा उन वरिष्ठ अधिकारियों में से किया जाना चाहिए, जिन्हें UPSC की प्रक्रिया के तहत पैनल में शामिल किया जाता है। पैनल तैयार करते समय अधिकारियों की सेवा अवधि, बेदाग और उत्कृष्ट सेवा रिकॉर्ड तथा पुलिस बल का नेतृत्व करने के अनुभव जैसे मानकों पर विचार किया जाता है।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि DGP के रूप में नियुक्त अधिकारी को कम से कम दो वर्ष का कार्यकाल मिलना चाहिए। यह कार्यकाल अधिकारी की सामान्य सेवानिवृत्ति की तारीख से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
इसी प्रावधान के आधार पर झारखंड में तदाशा मिश्रा की नियुक्ति महत्वपूर्ण हो जाती है। नियुक्ति के समय उनकी सेवा अवधि महज एक दिन बची थी, लेकिन DGP के तौर पर उन्हें दो साल का कार्यकाल प्रदान किया गया।
छह महीने की सेवा शेष रहने की शर्त क्यों अहम?
DGP की नियुक्ति में छह महीने की न्यूनतम सेवा शेष रहने की शर्त का उद्देश्य केवल तकनीकी पात्रता तय करना नहीं है। इसके पीछे पुलिस प्रमुख को पर्याप्त समय देने और पद की संस्थागत स्थिरता सुनिश्चित करने की सोच है। यदि किसी अधिकारी की नियुक्ति सेवानिवृत्ति से ठीक पहले कर दी जाती है और उसे दो साल का कार्यकाल मिल जाता है, तो इससे चयन प्रक्रिया के उस उद्देश्य पर सवाल उठ सकता है जिसके तहत अपेक्षाकृत लंबी सेवा अवधि वाले योग्य अधिकारियों में से पुलिस प्रमुख का चयन किया जाना है। झारखंड में तदाशा मिश्रा की नियुक्ति का विवाद इसी कानूनी और प्रशासनिक कसौटी के इर्द-गिर्द घूम रहा है।






