
रामगढ़:रामगढ़ का पैतृक गांव नेमरा गुरुवार को एक ऐसे मंजर का गवाह बना, जहां सत्ता की चमक पूरी तरह फीकी पड़ गई और केवल एक बेबस बेटे के आंसुओं की भाषा सुनाई दी। झारखंड की राजनीति के केंद्रबिंदु हेमंत सोरेन आज मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि अपनी मां रूपी सोरेन के वियोग में टूटे एक साधारण पुत्र के रूप में नजर आए।
गांव की संकरी पगडंडियों से जब पारंपरिक विधि-विधान के साथ अंतिम यात्रा निकली, तो वहां कोई बड़ा-छोटा नहीं रहा। क्या आम ग्रामीण, क्या सियासी विरोधी, क्या समर्थक और क्या आला प्रशासनिक अफसर—सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर लोग किसी राजनीतिक जुटान के लिए नहीं, बल्कि परिवार के इस निजी आघात में शरीक होने पहुंचे थे। पूरा गांव मानों सन्नाटे की चादर में लिपट गया था।
श्मशान घाट पर वह लम्हा सबसे भारी गुजरा जब हेमंत सोरेन ने कांपते हाथों से चिता को मुखाग्नि सौंपी। आग की लपटें जैसे ही उठीं, हेमंत के चेहरे पर मां को हमेशा के लिए खो देने का दर्द साफ छलका और वहां मौजूद हुजूम की आंखें भी छलक पड़ीं।

अंतिम विदाई के इन पलों ने साबित कर दिया कि सत्ता और पद चाहे कितने भी ऊंचे क्यों न हों, मां की छांव छिनने का दुख हर इंसान के लिए एक जैसा ही असहनीय होता है।





