जमशेदपुर:
जमशेदपुर के टेल्को स्थित प्रकाश नगर में तमिल संस्कृति और परंपरा की अनूठी छटा देखने को मिल रही है। यहाँ रहने वाले विशालाक्षी शेषाद्रि (सरसा) और के. आर. शेषाद्रि (सुरेश) के निवास पर इस वर्ष भी पारंपरिक और भव्य ‘बोम्मई कोलु’ (Bommai Kolu) का दिव्य दरबार सजाया गया है।
क्या है बोम्मई कोलु की परंपरा?
भारतीय तमिल समाज में नवरात्रि के दौरान ‘बोम्मई कोलु’ सजाने की प्राचीन परंपरा है। तमिल भाषा में ‘बोम्मई’ का अर्थ ‘गुड़िया’ और ‘कोलु’ का अर्थ ‘सजना’ या ‘दिव्य दरबार’ होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब माँ दुर्गा महिषासुर राक्षस से युद्ध करने के लिए निकली थीं, तब सभी देवी-देवताओं ने अपनी शक्तियां माँ दुर्गा को अर्पित कर दी थीं और वे स्वयं मूर्तियों के रूप में परिवर्तित होकर इस महासंग्राम के साक्षी बने थे। इसी पौराणिक कथा के आधार पर हर साल नवरात्रि में यह दिव्य दरबार सजाया जाता है।
सीढ़ियों (पड़ी) पर सजी आस्था की सुंदर श्रृंखला
कोलु के लिए लकड़ी या स्टील की विषम संख्या (जैसे 1, 3, 5, 7, 9, 11) में सीढ़ियां बनाई जाती हैं, जिन्हें ‘पड़ी’ कहा जाता है। महालय अमावस्या के दिन लाल चंदन या टीक की लकड़ी से बने पारंपरिक दूल्हा-दुल्हन यानी ‘मरपाची बोम्मई’ को दूध और हल्दी से स्नान कराकर उनका श्रृंगार किया जाता है और घर के मंदिर में स्थापित करने के बाद सीढ़ियों को सजाया जाता है।
इस वर्ष शेषाद्रि परिवार के घर सजी इस कोलु पड़ी की भव्यता देखते ही बनती है:
- प्रथम सीढ़ी (शीर्ष): यहाँ पारंपरिक मरपाची बोम्मई के साथ प्रथम पूज्य भगवान गणेश, भगवान श्रीकृष्ण और गैया (गायों) की सुंदर मूर्तियां विराजमान हैं।
- मध्य सीढ़ी: इस पड़ी पर दशावतार, अष्ट लक्ष्मी और गुरुओं की दिव्य मूर्तियां स्थापित की गई हैं।
- निचली सीढ़ियां: यहाँ विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों और नर्तकों की कलात्मक मूर्तियां सजाई गई हैं।
- विशेष आकर्षण: इसके साथ ही भगवान श्रीनिवास और देवी पद्मावती के विवाह का मनमोहक दृश्य भी दर्शाया गया है। सीढ़ी के नीचे एक छोटे से बाजार का जीवंत दृश्य प्रस्तुत किया गया है, जहाँ सेठ-सेठानी, फल-सब्जी और बर्तन बेचने वाले दुकानदारों की सुंदर आकृतियां लोगों को आकर्षित कर रही हैं।
नौ दिनों का सामाजिक और आध्यात्मिक उत्सव
कोलु के इन नौ दिनों के दौरान आस-पास की सभी महिलाएं और बच्चे एक-दूसरे के घर कोलु देखने पहुंचते हैं। इस दौरान पूरा माहौल भक्तिमय रहता है, जहाँ पारंपरिक भक्ति गीत और ललिता सहस्रनाम का पाठ किया जाता है। मेहमानों के स्वागत के लिए हर दिन चने का विशेष प्रसाद (जैसे मटर चना, काबुली चना आदि) तैयार किया जाता है। उत्सव के अंत में सभी सुहागन स्त्रियों को ‘ताम्बुलम’ (पान, सुपारी, हल्दी, कुमकुम, नारियल और उपहार) भेंट स्वरूप दिया जाता है।
दसवें दिन विश्राम की परंपरा
दशहरे (विजयदशमी) के दिन देवी के सम्मान और युद्ध की समाप्ति के बाद प्रतीकात्मक रूप से बोम्मई (गुड़ियों) को सुला दिया जाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि युद्ध के पश्चात सभी देव-शक्तियों को विश्राम दिया जा रहा है। इसी के साथ यह नौ दिवसीय भव्य पर्व हर्षोल्लास के साथ संपन्न होता है।
प्रकाश नगर में सजे इस पारंपरिक कोलु दर्शन के लिए पहुँच रहे लोग तमिल संस्कृति की इस खूबसूरत विरासत की मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रहे हैं।



