
ब्रिटिशकालीन औपनिवेशिक शासन से विरासत में मिली पीस बॉन्ड की व्यवस्था की आवश्यकता, प्रासंगिकता और वर्तमान उपयोग की गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर किसी भी निवारक कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को सीमित करने या असहमति की आवाज़ को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 126 के अंतर्गत शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र संबंधी कार्यवाही की जा सकती है। हालांकि, इस शक्ति का प्रयोग निर्धारित वैधानिक शर्तों, ठोस तथ्यों और निष्पक्ष प्रक्रिया के अनुरूप होना अनिवार्य है।
यदि पीस बॉन्ड की कार्यवाही का इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों में भाग लेने वाले नागरिकों को हतोत्साहित करने, प्रशासन की आलोचना पर दबाव बनाने या वैध असहमति को सीमित करने के लिए किया जाता है, तो यह गंभीर संवैधानिक चिंता का विषय है। केवल विरोध करना या असहमति व्यक्त करना अपने-आप में शांति भंग होने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता; कार्रवाई का औचित्य संबंधित तथ्यों और परिस्थितियों से स्थापित होना चाहिए।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) क्रमशः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्वक और निरस्त्र सभा करने के अधिकार की गारंटी देते हैं, जो संविधान में निर्धारित उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं। किसी भी निवारक कार्रवाई को इन अधिकारों और विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। *इसलिए नेहा बोरा का हस्ताक्षर न करना सही निर्णय है* |
समय की मांग है कि ब्रिटिशकालीन औपनिवेशिक कानूनों और उनसे जुड़ी दमनकारी प्रवृत्तियों की समीक्षा कर आवश्यक विधायी सुधार किए जाएँ। कानून का उद्देश्य वास्तविक रूप से शांति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना होना चाहिए, न कि शांतिपूर्ण विरोध या लोकतांत्रिक असहमति को नियंत्रित करना। एक संवैधानिक लोकतंत्र में नागरिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक जवाबदेही और विधि का शासन सर्वोपरि होने चाहिए।”




