ग्राफ़िक छवियाँ (ईटीवी भारत)
धनबाद: सरकार सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, लेकिन धनबाद के धनसार स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय चांदमारी की तस्वीर इन दावों की हकीकत बयां करती है. यहां के करीब 272 बच्चे एक ऐसी इमारत में पढ़ने को मजबूर हैं जिसकी छत कभी भी गिर सकती है. कहीं भवन का प्लास्टर टूटकर गिर रहा है तो कहीं लोहे की छड़ें बाहर निकल रही हैं।
मध्याह्न भोजन भवन की छत भी जर्जर है
क्लास रूम में बारिश का पानी टपकता रहता है और सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जिस रसोई घर में बच्चों का मध्याह्न भोजन बनता है उसकी छत भी जर्जर हो गयी है. ईटीवी भारत की टीम जब मौके पर पहुंची तो जो तस्वीरें सामने आईं उसने पूरी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
दीवारों से प्लास्टर उखड़ रहा है
धनसार स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय चांदमारी में कुल 272 बच्चे नामांकित हैं. पहली नजर में ही स्कूल भवन अपनी खस्ताहालत की कहानी बयां कर देता है। भवन की दीवारों का प्लास्टर झड़ गया है. छत के चारों ओर की छज्जे अब जर्जर हो चुकी हैं और जगह-जगह से लोहे की छड़ें बाहर झाँक रही हैं।
बारिश में छत से टपकता पानी
बरसात के दिनों में स्थिति और भी बदतर हो जाती है। दो कक्षाओं की छत इतनी कमजोर हो गई है कि वहां कभी भी हादसा हो सकता है। अन्य कक्षाओं में भी बारिश के दौरान लगातार पानी टपकता रहता है। मजबूरी ऐसी है कि बच्चे इन्हीं कमरों में बैठकर पढ़ाई करते हैं। शिक्षक पढ़ाते हैं लेकिन सभी के मन में यह डर बना रहता है कि कहीं छत का कोई हिस्सा अचानक गिर न जाए.
छात्रों की सुरक्षा को सबसे बड़ा खतरा!
स्कूल की रसोई का हाल भी कुछ ऐसा ही है. इसी स्थान पर बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन बनाया जाता है, लेकिन इस कमरे की छत पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है. बारिश होते ही पानी सीधे अंदर टपकने लगता है. इस कमरे के सामने बच्चे लाइन लगाकर भोजन का इंतजार करते हैं, यानी बच्चों के पोषण की जिम्मेदारी तो पूरी होनी चाहिए, लेकिन उनकी सुरक्षा सबसे ज्यादा खतरे में नजर आती है। अब सवाल यह है कि अगर इस दौरान कोई बड़ा हादसा हो गया तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
टॉयलेट में सुरक्षा और गोपनीयता दोनों गायब
स्कूल में शौचालय की व्यवस्था भी बेहद खराब है. दो शौचालय पूरी तरह जर्जर होकर कूड़े का ढेर बन गये हैं. दो अन्य शौचालयों में हमेशा ताला लगा रहता है. ऐसे में बच्चों के लिए एक छोटी सी जगह को कम ऊंचाई की दीवार से घेरकर अस्थायी शौचालय तो बना दिया गया है, लेकिन सुरक्षा और गोपनीयता दोनों गायब हैं. कैमरे में यह भी कैद हुआ है कि कुछ बच्चे उसी छोटी दीवार को फांदकर आ-जा रहे थे. इस दृश्य से साफ पता चलता है कि स्कूल में बुनियादी सुविधाओं की कितनी कमी है.
बच्चों को सता रहा हादसे का ‘डर’!
जब मैंने स्कूली बच्चों से बात की तो उनके चेहरे पर पढ़ाई से ज्यादा डर और तनाव देखा. बच्चों ने बताया कि बारिश के दौरान छत से लगातार पानी टपकता रहता है. कई बार प्लास्टर भी टूटकर गिर चुका है। उनका कहना है कि हर दिन उन्हें इस डर के साथ क्लास में बैठना पड़ता है कि कहीं कोई बड़ा हादसा न हो जाए. मासूम बच्चों की ये चिंता बताती है कि उन्हें पढ़ाई से पहले अपनी सुरक्षा की ज्यादा चिंता है.
सुधार के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए
अभिभावकों का गुस्सा भी साफ नजर आ रहा है. उनका आरोप है कि स्कूल व्यवस्था काफी समय से खराब है लेकिन इसमें सुधार के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है. उन्होंने कहा कि जर्जर छत के नीचे बच्चों को पढ़ाना उनके जीवन से खिलवाड़ है. कुछ अभिभावकों ने शिक्षकों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों की शिक्षा नियमित एवं गुणवत्तापूर्ण नहीं हो रही है. कई बार बच्चे तीन-चार घंटे में ही घर लौट आते हैं।
विवाह समारोह स्कूलों में होते हैं
स्थानीय महिला पार्वती देवी ने एक और गंभीर समस्या की ओर ध्यान दिलाया. उन्होंने बताया कि क्षेत्र में शादी विवाह के लिए कोई सामुदायिक भवन नहीं है. ऐसे में अक्सर स्कूल परिसर का इस्तेमाल शादी समारोह के लिए किया जाता है. कार्यक्रम के कारण बच्चों की पढ़ाई एक दिन के लिए बाधित होती है, बाद में साफ-सफाई के बाद दोबारा कक्षाएं शुरू होती हैं. सवाल यह है कि क्या शिक्षा का मंदिर सामाजिक आयोजनों का अड्डा बन गया है?
स्कूल की गुणवत्ता से समझौता
अभिभावकों की शिकायत का सच जानने के लिए हमारी टीम ने स्कूली बच्चों से कुछ बेहद सामान्य सवाल पूछे लेकिन जवाब चौंकाने वाले थे. छठी कक्षा के छात्र राजा से जब स्कूल का नाम और प्रधानाध्यापक का नाम पूछा गया तो वह नहीं बता सका. देश का नाम पूछा तो उसने झारखंड बताया. जब उनसे राज्य का नाम पूछा गया तो उन्होंने कहा चांदमारी. इसी तरह कक्षा चार के एक अन्य छात्र शिवा से जब देश का नाम पूछा गया तो उसने भी झारखंड बताया. वह राज्य का नाम नहीं बता सके और जब उनसे जिले के बारे में पूछा गया तो भी उनका जवाब झारखंड ही था.
ये जवाब न सिर्फ बच्चों की कमजोरी बल्कि शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं. आखिर कई वर्षों से स्कूल आने वाले बच्चे अगर देश, प्रदेश और जिले का नाम तक नहीं बता पा रहे हैं तो शिक्षा की गुणवत्ता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
मीडिया कवरेज से भड़के शिक्षक
जब हमारी टीम स्कूल परिसर की स्थिति और बच्चों की गतिविधियों को कैमरे में कैद कर रही थी, तभी संस्कृत और गणित के शिक्षक चतुरानन चौबे नाराज हो गये. उन्होंने पूछा कि स्कूल में आने की इजाजत किसने दी? और परमिशन दिखाने को कहा. उन्होंने कहा कि कैमरे के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है.
हालांकि उन्हें बताया गया कि लंच टाइम में कवरेज हो रही थी और उस वक्त नियमित पढ़ाई नहीं चल रही थी, बाद में अन्य शिक्षक मौके पर पहुंचे और मामले को शांत कराया.
प्रधानाध्यापक ने स्वीकार किया कि भवन का कई हिस्सा जर्जर है.
विद्यालय के प्रधानाध्यापक उमेश कुमार यादव ने स्वीकार किया कि भवन का कई हिस्सा जर्जर है. उन्होंने कहा कि इसकी जानकारी विभाग को लिखित रूप से दे दी गयी है. उन्होंने स्वीकार किया कि बारिश के दौरान रसोई में पानी टपकता है और कक्षा पांच की छत की स्थिति भी काफी दयनीय है.
विद्यालय में नियमित जलापूर्ति नहीं होती है
उन्होंने शौचालयों की खराब हालत के लिए पानी की कमी को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि यहां पीट वाटर की आपूर्ति की जाती है, लेकिन वह भी नियमित रूप से नहीं मिल पाता है. उन्होंने यह भी कबूल किया कि छात्र और छात्राओं के लिए कम ऊंचाई की दीवार से घेरकर अस्थायी शौचालय बनाया गया है.
बच्चों के दीवार पर चढ़ने के सवाल पर उन्होंने कहा कि हर बच्चे पर लगातार नजर रखना संभव नहीं है. उन्होंने बताया कि विद्यालय में दो पारा शिक्षक समेत कुल 7 शिक्षक हैं.
सरकारी स्कूलों की कड़वी हकीकत
यह सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं है बल्कि उन सभी सरकारी स्कूलों की कड़वी हकीकत है, जहां बच्चे शिक्षा लेने तो आते हैं लेकिन उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। इनमें जर्जर छतें, खराब शौचालय, टपकता बारिश का पानी और शिक्षा की कमजोर बुनियाद जैसे कारक शामिल हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या योजनाओं और दावों से ही शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी? या फिर इन 272 बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए अब जमीनी स्तर पर कार्रवाई होगी?
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