जिस घर में शराब का सेवन, मांस, जुआ, सदाचारी व्यक्ति का अनादर हो वह घर श्मशान के समान – जीयर स्वामी।

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शुभम जायसवाल

श्री बंशीधर नगर (गढ़वा):— पूज्य संत श्री श्री 1008 श्री लक्ष्मी प्रपन्न जियर स्वामी जी महाराज ने कहा कि गंगा स्नान का मतलब अनीति, अन्याय, बेईमानी, अधर्म,पाप का त्याग से है। शास्त्र में बताया गया है कि जहां पर इस घर में,  इस समाज में, इस राष्ट्र में, जिस प्रजा में, जिस समुदाय में ईश्वर ब्रम्ह को कभी याद न किया जाता हो, कभी चिंतन न किया जाता हो, नितध्यासन न किया जाता हो, गुण गान न किया जाता हो वह घर श्मशान के समान बताया गया है। जहां पर सदाचारी,संत महात्मा, ज्ञानी स्त्रियों का आदर नही हो, बालकों को शिक्षा न दिया जाता हो वह घर श्मशान के समान बताया गया है। जहां पर जुआ खेला जाता है, शराब का व्यसन है, अनेक प्रकार खान पान उपद्रव कारी है मांस इत्यादि का सेवन होता हो वह भी घर श्मशान के समान बताया गया है।

मानव पशुओं के समान भोजन, संतानोत्पत्ति करे तो मानव पशु में कोई अंतर नही।

भोजन तो अनेक योनियों में हम करते हैं शयन तो हम अनेक योनियों में हम करते हैं। संतान उत्पति तो अनेक योनियों में करते हैं। केवल इसके लिए इस संसार में हम जन्म नही लिए हैं। यदि इन सबके लिए इस संसार में हम आए होते तो परमात्मा हमलोगों को मनुष्य नही बनाते बल्कि इसके जगह पर और कोई जन्तु बनाते। मानव की पहचान संस्कृति है, संस्कार है। सभ्यता है, सरलता है, सहजता है, कोमलता है। यदि यह मनुष्य में न हो केवल संसार में पशुओं के समान भोजन करे, संतानोत्पत्ति करे मनुष्य और पशु में कोई अंतर नही है।

उन्होंने कहा कि गलत तरीके से आयी लक्ष्मी उपद्रवकारी होती हैं। इन्हें संभालना मुश्किल होता है। लक्ष्मी का सदैव सदुपयोग होना चाहिए। जिस परिवार और समाज में लक्ष्मी का उपभोग होने लगता है। वहाँ एक साथ कई विकार उत्पन्न हो जाते हैं। अंततः वह पतन का कारण बनता है। स्वामी जी ने कहा कि आषाढ़ पूर्णिमा को व्यास जी का अवतरण हुआ था। इसीलिए इस तिथि को गुरु-पूर्णिमा मनाने की परम्परा है। व्यास जी को नहीं मानने वाले भी गुरु-पूर्णिमा मनाते हैं।

स्वामी जी ने कहा कि गुरु सिद्ध होना चाहिए, चमत्कारी नहीं। जो परमात्मा की उपासना और भक्ति की सिद्धि किया हो, वही गुरु है। गुरु का मन स्थिर होना चाहिए, चंचल नहीं। वाणी-संयम भी होनी चाहिए। गुरु समाज का कल्याण करने वाला हो और दिनचर्या में समझौता नहीं करता हो। गुरू भोगी-विलासी नहीं हो। उन्होंने कहा कि गुरु और संत का आचरण आदर्श होना चाहिए। जिनके दर्शन के बाद परमात्मा के प्रति आशक्ति और मन में शांति का एहसास हो, वही गुरु और संत की श्रेणी में है। गुरु दम्भी और इन्द्रियों में भटकाव वाला नहीं होना चाहिए। गुरु सभी स्थान व प्राणियों में परमात्मा की सत्ता स्वीकार करने वाला हो।

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