
सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर खड़े किए तीखे सवाल
रांची/जमशेदपुर:
सरकारी वादों की सुस्त रफ्तार और फाइलों में दबी संवेदनाओं के बीच एमजीएम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल का बहुचर्चित छत हादसा अब कानूनी चौखट तक पहुंच गया है। हादसे को गुजरे 15 महीने से अधिक का वक्त बीत चुका है, लेकिन पीड़ितों के जख्मों पर राहत का मरहम लगाने के सरकारी दावे अब तक कागजी ही साबित हुए हैं। इसी प्रशासनिक लेटलतीफी को मुद्दा बनाते हुए जन विकास मंच के अध्यक्ष सौरभ विष्णु ने झारखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर सरकार और अस्पताल प्रबंधन को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
घोषणाओं और हकीकत का फासला
3 मई 2025 को हुए इस दर्दनाक हादसे में डेविड जॉनसन, लुकास साइमन तिर्की, श्रीचंद तांती और रेणुका देवी ने अपनी जान गंवाई थी। उस वक्त राज्य सरकार की ओर से मृतकों के परिजनों को ₹5 लाख और घायलों को ₹50 हजार मुआवजा देने का ऐलान जोर-शोर से किया गया था। याचिका के जरिए अदालत को बताया गया कि 16 सितंबर 2026 तक भी पीड़ितों को यह सहायता राशि नहीं मिल सकी। हैरानी की बात यह है कि 31 अगस्त 2026 को आरटीआई (RTI) के तहत खुद एमजीएम प्रबंधन ने स्वीकार किया कि भुगतान प्रक्रिया अब तक अधूरी है।
‘संवैधानिक अपकृत्य और प्रशासनिक क्रूरता’
अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा के माध्यम से दाखिल इस याचिका में सौरभ विष्णु ने बेहद कड़े कानूनी तर्क रखे हैं:
संवैधानिक उल्लंघन: घोषित सहायता को 15 महीने तक अटकाए रखना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन और ‘संवैधानिक अपकृत्य’ (Constitutional Tort) है।
मानसिक उत्पीड़न: शोकाकुल परिजनों को अपने ही हक के लिए दफ्तरों के चक्कर लगवाना प्रशासनिक असंवेदनशीलता का चरम रूप है, जिसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
अस्पतालों के सेफ्टी ऑडिट की मांग
याचिका में केवल मुआवजे तक ही बात सीमित नहीं रखी गई है, बल्कि व्यवस्थागत सुधारों की भी मांग की गई है:
राज्य के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों का किसी स्वतंत्र एजेंसी से स्ट्रक्चरल एवं फायर सेफ्टी ऑडिट कराया जाए।
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आम जनता के जीवन-सुरक्षा मानकों को अस्पतालों में अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।
मामले में राज्य सरकार, मुख्य सचिव, स्वास्थ्य विभाग, भवन निर्माण विभाग, पूर्वी सिंहभूम के डीसी, एमजीएम अधीक्षक और सिविल सर्जन को प्रतिवादी बनाया गया है।
“लड़ाई हक और व्यवस्था की है”
पूरे मामले पर बात करते हुए सौरभ विष्णु ने कहा कि यह याचिका किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उस लचर कार्यप्रणाली के खिलाफ है जिसने अपनों को खो चुके परिवारों को महीनों भटकने पर मजबूर किया। उन्होंने उम्मीद जताई कि अदालत के दखल के बाद पीड़ितों को न्याय मिलेगा और भविष्य में किसी अन्य सरकारी अस्पताल में ऐसी लापरवाही दोहराई नहीं जाएगी।





