नई दिल्ली: पिछले कुछ हफ्तों में भारत के सबसे सामान्य और रोज़मर्रा के खाद्य पदार्थ (दूध और डेयरी उत्पाद) राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बहस के केंद्र में आ गए हैं। तब से लेकर अब तक यह मुद्दा केवल उपभोक्ता चिंता तक सीमित नहीं रहा बल्कि सामाजिक मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हो चुका है और विशेषज्ञों तथा नियामकों को तर्क-वितर्क में खड़ा कर दिया है।
यह विवाद एक स्वतंत्र टेस्टिंग प्लेटफॉर्म Trustified के वायरल वीडियो से शुरू हुआ, जिसमें ब्लाइंड टेस्टिंग के दौरान बड़े नामी ब्रांड के पाउच दूध में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा राष्ट्रीय मानकों से 98 गुना अधिक पाई गई, खासकर Amul Taaza और Amul Gold में। इसी तरह Mother Dairy और Country Delight के पाउच दूध में टोटल प्लेट काउंट सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक पाया गया, जो स्वच्छता और गुणवत्ता के लिए चिंता का संकेतक होता है।
मदर डेयरी के गाय के दूध का Total Plate Count लगभग 2,40,000 CFU/ml पाया गया, जबकि खाद्य सुरक्षा मानक FSSAI के अनुसार यह सीमा 30,000 CFU/ml है। वहीं कंट्री डिलाइट के दूध में TPC 60,000 CFU/ml दर्ज किया गया, जो सुरक्षित सीमा से दोगुना अधिक है। अमूल Taaza और Gold ब्रांड के दूध में Coliform बैक्टीरिया की मात्रा भी FSSAI के निर्धारित स्तर से अधिक पाई गई। Taaza में यह संख्या 980 CFU/ml थी, जबकि Gold में 25 CFU/ml दर्ज की गई।
इसी समूह ने एक महीने पहले Amul की पाउच दही (Amul Masti) की जांच में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया, यीस्ट और फफूंदी की अधिक मात्रा होने का दावा भी किया था, जबकि टेट्रा पैक और कप में मिलने वाला दही परीक्षण में सुरक्षित पाया गया था।
क्या है कोलीफॉर्म बैक्टीरिया?
कोलीफॉर्म बैक्टीरिया सूक्ष्मजीवों का एक समूह है जो आमतौर पर मिट्टी, पानी और गर्म खून वाले जानवरों के पाचन तंत्र में पाया जाता है. डेयरी उद्योग में, इनकी उपस्थिति को हाइजीन फेलियर (स्वच्छता की कमी) का संकेत माना जाता है। हालांकि कोलीफॉर्म के अधिकांश स्ट्रेन सीधे तौर पर गंभीर बीमारी नहीं फैलाते, लेकिन पाश्चुरीकृत (Pasteurized) दूध में इनकी मौजूदगी यह दर्शाती है कि उत्पादन या वितरण के दौरान गंदगी रही है। उच्च कोलीफॉर्म स्तर होने पर ई. कोली (E. coli) या साल्मोनेला जैसे घातक रोगजनकों की मौजूदगी की संभावना काफी बढ़ जाती है।
ब्रांडों की प्रतिक्रिया: जानकारी भ्रामक, भ्रम फैलाने वाला
इन आरोपों पर Amul ने कड़ा रुख अपनाया है। कंपनी का कहना है कि उनके सभी उत्पाद FSSAI के सुरक्षा मानकों पर खरे उतरते हैं, और वायरल रिपोर्ट्स भय फैलाने वाली और बिना पर्याप्त वैज्ञानिक आधार वाली हैं। अमूल ने स्पष्ट किया कि जहां भी समस्या देखी गई, वह निर्माण की प्रक्रिया में नहीं बल्कि सप्लाई चेन के दौरान कोल्ड चेन के टूटने से हो सकती है।
वास्तविकता: सप्लाई चेन की कमजोरी या प्रणालीगत विफलता?
इन विवादों के बीच उपभोक्ताओं में दूध की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है, खासकर जब कई राज्यों जैसे गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अवैध डेयरी यूनिटों पर छापे और रेड की खबरें भी सामने आईं।
गुजरात में एक पुलिस और खाद्य सुरक्षा अधिकारी की छापेमारी में, आरोप था कि 300 लीटर असली दूध में पानी, दूध पाउडर, कास्टिक सोडा, तेल, डिटर्जेंट और यूरिया मिलाकर रोज़ाना लगभग 1,800 लीटर नकली दूध तैयार किया जा रहा था। मौके पर ही 1,370 लीटर असुरक्षित दूध नष्ट कर दिया गया, जिसमें से अधिकांश में खतरनाक रसायन और मिलावट थी।
FSSAI ने अभियान तेज किया, निगरानी और सैंपलिंग बढ़ाई
इन लगातार खुलासों और बढ़ती उपभोक्ता चिंताओं को देखते हुए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने देशव्यापी अभियान तेज कर दिया है। मिलावट, गलत लेबलिंग और गुणवत्ता नियंत्रण की जांच को प्राथमिकता दी जा रही है, और सप्लाई चेन में निगरानी तथा सैंपलिंग बढ़ाई जा रही है।
संसद में जवाब देते हुए सरकार ने बताया कि देश भर में 246 मान्यता प्राप्त फूड टेस्टिंग लैब, 24 रेफरल लैब, और 300 से अधिक मोबाइल (Food Safety on Wheels) यूनिट्स मिलावट विरोधी अभियानों में काम कर रही हैं।
समस्या क्या है?
हालांकि सरकारी कार्रवाई जारी है, कई उपभोक्ताओं को यह कदम प्रतिक्रिया की तरह और रोकथाम की बजाय बाद में उपाय जैसा लग रहा है। इसी वजह से सोशल मीडिया पर विशेषज्ञों की एक अलग ही बहस शुरू हो गई है, जिसमें वे मुद्दे की जड़ तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। डेयरी विशेषज्ञों का कहना है कि कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का होना हमेशा मानव मल से प्रदूषण का संकेत नहीं है। भारत में यह अक्सर हाथ से दुहाई के दौरान गोबर या अन्य प्राकृतिक स्रोतों से भी आ सकता है, खासकर जब स्वच्छता की स्थिति खराब हो। यही कारण है कि पारंपरिक रूप से दूध को उबालकर पीने की सलाह दी जाती रही है।
पाश्चराइजेशन vs. UHT: सुरक्षा में कितना अंतर?
विशेषज्ञों के अनुसार आमतौर पर बड़े ब्रांड का पाउच दूध HTST (High Temperature Short Time) पाश्चराइजेशन के ज़रिये सुरक्षित किया जाता है, लगभग 72°C पर 15 सेकंड तक गर्म करके फिर तेजी से ठंडा किया जाता है। इससे 99% से अधिक रोगाणु मर जाते हैं, लेकिन दूध को पूरी तरह स्टेराइल नहीं बनाया जाता। यदि सप्लाई चेन के दौरान कोल्ड चेन टूट जाता है, तो बचे हुए बैक्टीरिया तेजी से बढ़ सकते हैं। इसलिए पाश्चराइज्ड दूध को कच्चा पीना सुरक्षित नहीं माना जाता, और उसे उबालकर ही उपयोग में लाया जाना चाहिए।
दूसरी ओर UHT (Ultra High Temperature) दूध, जो टेट्रा पैक में बेचा जाता है, इससे अलग है। इसे 135°C से अधिक तापमान पर गर्म किया जाता है और स्टेराइल पैकेजिंग में सील किया जाता है, जिससे यह कुछ उत्पादों की तुलना में अधिक सुरक्षित रहता है और यही कारण है कि हाल के परीक्षणों में UHT/टेट्रा पैक दूध की गुणवत्ता लगातार बेहतर साबित हुई है।
विशेषज्ञों ने कुछ व्यवहारिक सुझाव भी दिए हैं
• पाउच दूध खरीदते ही उसे उबालकर इस्तेमाल करें।
• केवल पाश्चराइजेशन पर पूरी तरह निर्भर न रहें।
• बच्चों और बुजुर्गों के लिए अधिक सुरक्षित विकल्प के तौर पर UHT या टेट्रा पैक दूध चुनें।
घरेलू ‘होम टेस्ट’ के आसान तरीके अपनाएं
स्टार्च टेस्ट: उबले दूध में आयोडीन की बूंदें यदि रंग नीला हो जाए, तो मिलावट हो सकती है।
डिटर्जेंट टेस्ट: दूध और पानी मिलाकर हिलाएं, लंबे समय तक झाग बने रहना संदिग्ध है।
यूरिया टेस्ट: दूध और अरहर दाल पाउडर के मिश्रण में लाल लिटमस पेपर नीला होना यूरिया की उपस्थिति बता सकता है।
बाजार में उपलब्ध होम टेस्टिंग किट्स का इस्तेमाल करें। इनमें कुछ DRDO-स्वीकृत किट्स भी शामिल हैं।












