पलामू: नक्सलियों के गढ़ अति संवेदनशील पलामू टाइगर रिजर्व एवं बूढ़ापहाड़ से सटे गांवों में नक्सली अब हथियार छोड़ समाज की मुख्य धारा में लौटने लगे हैं और प्रशासन को जो सूचना उपलब्ध करा रहे हैं। उससे प्रशासन को बड़ी मदद मिल रही है और नक्सलवाद के सफाये और नक्सलियों को समाज की मुख्य धारा में शामिल करने की पहल में पूरी सहायता मिल रही है।
प्राप्त जानकारी केअनुसार वन विभाग के अधिकारियों को सितंबर से अब तक पलामू टाइगर रिजर्व क्षेत्र से लगभग 40 हथियार बरामद हुए हैं. ये सभी हथियार जंगल में छोड़े गए थे. सितंबर-अक्टूबर 2025 में वन्य जीव सप्ताह के दौरान पलामू टाइगर रिजर्व प्रशासन ने ग्रामीणों से हथियार छोड़ने की अपील की थी. इस दौरान 23 ग्रामीणों ने अपने हथियार जमा किए थे. उसके बाद से जंगल से लगभग 40 हथियार बरामद किए गए हैं.
ग्रामीणों ने घरों में देसी हथियार छिपाकर रखे थे. बरामद सभी हथियार स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए देशी हथियार हैं. इनका इस्तेमाल जंगली जानवरों के शिकार और खुद की सुरक्षा के लिए किया जा रहा था. प्रशासनिक जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ हथियारों का उपयोग नक्सल गतिविधियों में भी होता था. पिछले एक वर्ष के दौरान पलामू टाइगर रिजर्व में छापेमारी के दौरान 42 से अधिक हथियार बरामद किए गए हैं. जंगल से छोड़े गए और छापेमारी में बरामद सभी हथियारों को रिजर्व के गोदाम में रखा गया है.
बरामद हथियारों का कनेक्शन छत्तीसगढ़ से जुड़ा है. ये सभी 12 बोर के हथियार हैं, जिनकी मारक क्षमता करीब 30 मीटर है. ऐसे हथियार मुख्य रूप से वन्य जीवों के शिकार में इस्तेमाल होते हैं.
पलामू टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक प्रदेश कांत जेना के मुताबिक की इलाके में जन भागीदारी से कई कार्यक्रम चलाया जा रहे हैं और वन्य जीव की सुरक्षा को लेकर जागरूकता भी चलाई गई. पलामू टाइगर रिजर्व रिजर्व की तरफ अपील भी जारी की गयी थी कि जिनके पास पुराने देसी या भरठुआ हथियार हैं वह सरेंडर कर दें. इसके रिजल्ट भी काफी अच्छे मिले हैं. 30 से 40 हथियार जंगल से मिले हैं. ग्रामीण जंगल में हथियारों को रख रहे हैं और गोपनीय रूप से इसकी जानकारी साझा कर रहे हैं. हथियार को भी बरामद किया जा रहा है. यह अच्छी बात है कि लोग पारंपरिक शिकार को छोड़कर मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं, जिनका स्वागत किया जा रहा है. वैसे लोग जो हथियार रखे हुए हैं उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा रही है।
झारखंड-छत्तीसगढ़ सीमा के कई गांवों के ग्रामीण पारंपरिक शिकार के लिए लंबे समय से देशी हथियारों का इस्तेमाल करते रहे हैं. 70 के दशक तक पलामू इलाका वन्य जीव शिकार का बड़ा केंद्र रहा है. अंग्रेजी शासनकाल में यहां शिकार पर इनाम भी घोषित किए जाते थे. क्षेत्र में शिकार को लेकर सांस्कृतिक जुड़ाव भी रहा है. नक्सली हिंसा के दौरान कई ग्रामीणों ने हथियार छुपा लिए थे या नक्सलियों को सौंप दिए थे. नक्सलियों के कमजोर होने के बाद अब ग्रामीण हथियार छोड़ रहे हैं और गोपनीय रूप से प्रशासन तक पहुंचा रहे हैं.











