---Advertisement---

पेसा नियमावली की अधिसूचना जारी, अब ग्राम सभा करेगी जल-जंगल-जमीन पर फैसला; क्या-क्या मिले अधिकार

On: January 3, 2026 8:21 AM
---Advertisement---

रांची: पेसा नियमावली को सार्वजनिक करने की उठ रही मांग पर अब अंततः विराम लग गया है। राज्य सरकार के पंचायती राज विभाग ने शुक्रवार (2 जनवरी) को अधिसूचना जारी कर दी है। शुक्रवार देर शाम अधिसूचना के जारी होते ही आदिवासी इलाकों की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव साफ दिखने लगा है।


अब गांव के कैटेगरी-1 (पांच हेक्टेयर से कम) बालू घाट से लेकर जमीन की खरीद-बिक्री, शराब दुकान खोलने, फैक्ट्री लगाने और जंगल से मिलने वाले उत्पादों के उपयोग तक का निर्णय अफसर नहीं, बल्कि ग्राम सभा करेगी। दशकों से जिस स्वशासन की मांग आदिवासी समाज करता रहा, वह अब नियमों के रूप में जमीन पर उतरता दिख रहा है। पेसा नियमावली में ग्राम सभा के अध्यक्ष अनुसूचित क्षेत्र के पारंपरिक ग्राम सभा क्षेत्र में परंपरा से प्रचलित रीति रिवाज के अनुसार मान्यता प्राप्त व्यक्ति होंगे।


ग्राम सभा बनेगी सबसे ताकतवर इकाई


सरकार का दावा है कि पेसा नियमावली लागू होने से अनुसूचित क्षेत्रों में सत्ता का संतुलन बदलेगा। जहां अब तक बाहरी एजेंसियों और ठेकेदारों का दबदबा था, वहां अब गांव अपने संसाधनों का स्वामी होगा। कैबिनेट ने 23 दिसंबर को कुछ संशोधनों के साथ इस नियमावली को मंजूरी दी थी। अधिसूचना जारी होने के साथ ही झारखंड उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो गया है, जहां पेसा सिर्फ कानून नहीं, बल्कि नियमों के साथ लागू हो चुका है।
पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि राज्य में पेसा नियमावली लागू हो गई है। स्वशासन को जमीन पर उतारना सरकार की प्राथमिकता है। इससे ग्राम सभा को वास्तविक अधिकार मिलेंगे और जल-जंगल-जमीन पर उनका फैसला सर्वोपरि होगा।


पारंपरिक ग्राम सभा को वैधानिक दर्जा


नियमावली की खास बात यह है कि ग्राम सभा के गठन का अधिकार प्रशासन या सरकार के पास नहीं होगा। परंपरागत ग्राम सभा ही मान्य होगी। जनसंख्या की कोई बाध्यता नहीं होगी और ग्राम सभा स्थायी इकाई रहेगी, जिसे कभी भंग नहीं किया जा सकेगा। अनुसूचित क्षेत्रों में विकास योजनाएं भी ग्राम सभा की अनुमति से ही लागू होंगी। किसी भी छोटी-बड़ी कंपनी को ग्राम सभा की सहमति के बिना जमीन लेने की अनुमति नहीं होगी।


हर महीने बैठक, महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी


नियमों के अनुसार हर महीने कम से कम एक ग्राम सभा बैठक अनिवार्य होगी। बैठक के लिए एक-तिहाई सदस्यों का कोरम जरूरी होगा, जिसमें कम से कम एक-तिहाई महिलाओं की उपस्थिति अनिवार्य है। बैठक सार्वजनिक स्थान पर होगी। अगर बंद भवन में बैठक की जाती है तो दरवाजा खुला रखना होगा और किसी को प्रवेश से रोका नहीं जा सकेगा। ग्राम सभा की अध्यक्षता उसी गांव के अनुसूचित जनजाति समुदाय के परंपरागत रूप से मान्य व्यक्ति करेंगे।


बालू घाट, खनिज और वनोत्पाद पर अधिकार


कैटेगरी-1 (पांच हेक्टेयर से कम) के बालू घाटों का संचालन सीधे ग्राम सभा करेगी। बालू से मिलने वाला शुल्क ग्राम कोष में जाएगा। जेसीबी मशीन से खनन पर पूरी तरह रोक रहेगी और एनजीटी के निर्देश के अनुसार मानसून में बालू उठाव प्रतिबंधित रहेगा।
मिट्टी, पत्थर, बालू, मोरम जैसे लघु खनिजों का उपयोग, सिंचाई व्यवस्था का प्रबंधन, ग्राम स्तर पर होने वाले वनोत्पाद और अन्य उत्पादों का व्यापार ग्राम सभा के अधीन होगा। वन्य जीव संरक्षण की जिम्मेदारी भी ग्राम सभा को सौंपी गई है।


ग्राम कोष का गठन, आय का बंटवारा तय


पेसा नियमावली के तहत ग्राम कोष का गठन किया जाएगा। पंचायत समिति को होने वाली आय का 80 प्रतिशत ग्राम कोष में जमा होगा, जबकि 20 प्रतिशत पंचायत समिति के पास रहेगा। ग्राम कोष के संचालन के लिए तीन लोगों को तीन साल के लिए मनोनीत किया जाएगा।


शराब, फैक्ट्री और सामाजिक नियंत्रण


ग्राम सभा की अनुमति के बिना न शराब की दुकान खुलेगी और न ही कोई फैक्ट्री लगेगी। महुआ और हड़िया जैसे पारंपरिक पेय केवल घरेलू और सामाजिक उपयोग के लिए मान्य होंगे। शराब नियंत्रण में महिलाओं की निर्णायक भूमिका तय की गई है।


विवाद निपटारे का अधिकार भी ग्राम सभा को


पारिवारिक और जमीन से जुड़े छोटे विवाद अब ग्राम सभा में सुलझाए जाएंगे। ग्राम सभा अधिकतम 2000 रुपये तक का जुर्माना लगा सकेगी, हालांकि जेल भेजने का अधिकार नहीं होगा। यदि आरोपी अपनी गलती स्वीकार कर माफी मांगता है और दोबारा गलती न करने का संकल्प लेता है, तो उसे ही दंड माना जाएगा।


यदि पुलिस किसी को तत्काल गिरफ्तार करती है तो सात दिनों के भीतर इसकी सूचना ग्राम सभा को देना अनिवार्य होगा।
सीएनटी-एसपीटी मामलों में ग्राम सभा की सहमति जरूरी
सीएनटी-एसपीटी एक्ट से जुड़े मामलों में अब ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य होगी। यदि आदिवासी जमीन पर सीएनटी की धारा 71, 46, 48 या 239 का उल्लंघन कर कब्जा किया गया है, तो कब्जाधारी को बिना किसी मुआवजे के बेदखल किया जाएगा। जमीन मूल रैयत या उसके वारिस को सौंपी जाएगी। वारिस न होने पर जमीन किसी अन्य आदिवासी रैयत के नाम बंदोबस्त होगी। हर साल 15 अप्रैल तक रजिस्टर-2 की प्रति ग्राम सभा को उपलब्ध करानी होगी।


स्वशासन की दिशा में बड़ा कदम


पेसा कानून का मूल उद्देश्य पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को प्रशासन, संसाधन और परंपराओं पर निर्णय का अधिकार देना है। झारखंड में इसके नियमों के साथ लागू होने से ग्राम सभा अब सबसे सशक्त इकाई बन गई है। सरकार का मानना है कि इससे आदिवासी इलाकों में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और विकास की दिशा गांव खुद तय करेंगे।

Vishwajeet

मेरा नाम विश्वजीत कुमार है। मैं वर्तमान में झारखंड वार्ता (समाचार संस्था) में कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हूं। समाचार लेखन, फीचर स्टोरी और डिजिटल कंटेंट तैयार करने में मेरी विशेष रुचि है। सटीक, सरल और प्रभावी भाषा में जानकारी प्रस्तुत करना मेरी ताकत है। समाज, राजनीति, खेल और समसामयिक मुद्दों पर लेखन मेरा पसंदीदा क्षेत्र है। मैं हमेशा तथ्यों पर आधारित और पाठकों के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूं। नए विषयों को सीखना और उन्हें रचनात्मक अंदाज में पेश करना मेरी कार्यशैली है। पत्रकारिता के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करता हूं।

Join WhatsApp

Join Now