मुंबई: बॉम्बे हाई कोर्ट ने बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो एक्ट) के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली अपील खारिज करते हुए उसकी सजा में राहत दी है। अदालत ने आरोपी की आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 12 वर्ष के कारावास में बदल दिया है। यह फैसला न्यायमूर्ति सारंग वी. कोतवाल और न्यायमूर्ति संदीप देशपांडे की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी द्वारा किया गया अपराध अत्यंत गंभीर है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सजा की अवधि में कमी की जा सकती है।
क्या है पूरा मामला
अभियोजन पक्ष के अनुसार, दिसंबर 2016 में आरोपी ने अपनी पड़ोस में रहने वाली पांच वर्षीय बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न किया था। उस समय आरोपी की उम्र 20 वर्ष थी। मामले की सुनवाई के बाद, पॉक्सो एक्ट के तहत गठित विशेष अदालत ने दिसंबर 2020 में उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 (गंभीर प्रविष्ट यौन उत्पीड़न) के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। विशेष अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि पीड़िता की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय है और बचाव पक्ष उसकी कहानी को कमजोर करने में असफल रहा। इसके बाद आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी।
हाई कोर्ट ने साक्ष्यों और रिकॉर्ड का विस्तार से परीक्षण करने के बाद यह माना कि आरोपी के खिलाफ अपराध पूरी तरह सिद्ध होता है और दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह निष्कर्ष सही है कि आरोपी ने बलात्कार और पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध किया है।
हालांकि, सजा के प्रश्न पर अदालत ने कुछ नरमी दिखाई। पीठ ने नोट किया कि आरोपी अपराध के समय काफी कम उम्र का था और उसके खिलाफ कोई आपराधिक पूर्ववृत्त नहीं है। इसके अलावा, वह दिसंबर 2016 में गिरफ्तारी के बाद से लगातार जेल में है और उसे कोविड-19 महामारी के दौरान भी जमानत का लाभ नहीं मिला। इस प्रकार, वह अब तक नौ वर्षों से अधिक समय जेल में बिता चुका है।
सजा में कमी की मांग करते हुए आरोपी की ओर से अधिवक्ता ओ. पी. लालवानी ने अदालत के समक्ष कई प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए। इन दस्तावेजों से पता चलता है कि आरोपी ने जेल में रहते हुए विभिन्न शैक्षणिक और सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लिया।
इनमें पुणे की तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ द्वारा जारी प्रमाणपत्र शामिल था, जिसमें आरोपी के ‘पुस्तकों के विश्लेषण’ कार्यक्रम में सहभागिता का उल्लेख किया गया था। इसके अलावा, रामचंद्र प्रतिष्ठान, मुंबई द्वारा जारी प्रमाणपत्र में उसके एक ‘निबंध प्रतियोगिता’ में भाग लेने की पुष्टि की गई थी। वहीं, मुंबई सर्वोदय मंडल ने महात्मा गांधी के विचारों के अध्ययन से संबंधित पाठ्यक्रम और परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करने का प्रमाणपत्र दिया था।
अदालत ने कहा कि इन तथ्यों से यह संकेत मिलता है कि आरोपी में सुधार की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने कहा, इन सभी परिस्थितियों को सामूहिक रूप से देखते हुए हम सजा के प्रश्न पर कुछ नरमी दिखाने के इच्छुक हैं। हालांकि, अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यूनतम 10 वर्ष से अधिक की सजा देना आवश्यक है।
अंततः, हाई कोर्ट ने आरोपी की सजा को आजीवन कारावास से घटाकर 12 वर्ष कर दिया। साथ ही, विशेष अदालत द्वारा पॉक्सो एक्ट की धारा 33(8) के तहत पीड़िता को 25,000 रुपये मुआवजा देने का आदेश भी बरकरार रखा गया।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि आरोपी द्वारा पहले से जेल में बिताई गई अवधि को सजा की अवधि में समायोजित किया जाएगा।












