
रांची: झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की संयुक्त स्नातक स्तरीय प्रतियोगिता परीक्षा (JSSC-CGL) को लेकर झारखंड सरकार ने हाईकोर्ट में अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है। परीक्षा और इसके आधार पर हुई नियुक्तियों को रद्द करने के फैसले के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सरकार ने कहा कि पूरी परीक्षा प्रक्रिया गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। ऐसे में यह तय करना मुश्किल है कि किस अभ्यर्थी ने पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से सफलता हासिल की और किसे कथित अनियमितता का लाभ मिला।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में 42 पेज का काउंटर एफिडेविट (जवाबी हलफनामा) दाखिल कर परीक्षा रद्द करने के फैसले को उचित ठहराया है। सरकार का तर्क है कि जब पूरी परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो जाएं, तब केवल कुछ अभ्यर्थियों को अलग कर कार्रवाई करना व्यावहारिक और न्यायसंगत नहीं होगा। ऐसी स्थिति में पूरी परीक्षा रद्द करना ही जनहित में उचित कदम है।
जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने याचिकाकर्ताओं को राज्य सरकार की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे पर 10 दिनों के भीतर प्रत्युत्तर दाखिल करने की अनुमति दी। साथ ही, अदालत ने पूर्व में जारी अंतरिम आदेश को आगे भी प्रभावी रखने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने SIT की चल रही जांच के दौरान अभ्यर्थियों की ओर से सामने आ रही उत्पीड़न संबंधी शिकायतों पर नजर रखने के लिए सेवानिवृत्त जस्टिस गौतम कुमार चौधरी को Monitor/Observer नियुक्त किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस व्यवस्था का SIT की जांच पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जांच एजेंसी कानून के प्रावधानों के अनुसार अपनी जांच और आवश्यक कार्रवाई जारी रखने के लिए स्वतंत्र रहेगी। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी।
सरकार ने अपने जवाबी हलफनामे में कहा है कि सीआईडी की जांच के दौरान परीक्षा में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं से जुड़े तथ्य सामने आए। इन्हीं जांच निष्कर्षों को परीक्षा रद्द करने के फैसले का प्रमुख आधार बताया गया है।
हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट के वन शिखा बनाम केंद्र सरकार मामले में निर्धारित सिद्धांतों का भी हवाला दिया गया है। सरकार के मुताबिक, यदि किसी प्रतियोगी परीक्षा की पूरी प्रक्रिया ही दूषित पाई जाती है और निष्पक्ष अभ्यर्थियों तथा अनियमितता से लाभ लेने वालों के बीच स्पष्ट अंतर करना संभव नहीं हो, तो पूरी परीक्षा रद्द की जा सकती है।
सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि JSSC-CGL के प्रश्नपत्रों की छपाई और उन्हें परीक्षा केंद्रों तक सुरक्षित पहुंचाने जैसे महत्वपूर्ण और गोपनीय कार्य ICN Technology को सौंपे गए थे। जांच के दौरान एजेंसी की भूमिका में गंभीर अनियमितताएं सामने आने का दावा राज्य सरकार ने किया है।
हलफनामे के अनुसार, मामले की जांच के दौरान ICN Technology के CEO सोमांश प्रकाश समेत 28 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि 265 लोगों को नोटिस जारी किए गए।
राज्य सरकार के मुताबिक पैसे के बदले कुछ अभ्यर्थियों को परीक्षा से पहले ही प्रश्नों के उत्तर याद करवाए गए थे। सीआईडी जांच में आसनसोल, कोलकाता, बिहार, झरिया और बोकारो के अलावा नेपाल में भी अभ्यर्थियों को कथित तौर पर उत्तर याद करवाए जाने की जानकारी सामने आने का दावा किया गया है।
सरकार के मुताबिक, जांच में अभ्यर्थियों और परीक्षा एजेंसी से जुड़े लोगों के बीच कथित आर्थिक लेन-देन से संबंधित साक्ष्य भी मिले हैं।
हलफनामे में सरकार ने एक महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख करते हुए कहा है कि नेपाल में 28 अभ्यर्थियों को कथित तौर पर परीक्षा के उत्तर याद करवाए गए थे। इनमें से 10 अभ्यर्थी JSSC-CGL परीक्षा में सफल हुए। सरकार ने इसे परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित होने के अपने दावे के समर्थन में प्रमुख तथ्य के रूप में पेश किया है।
राज्य सरकार ने यह भी बताया कि परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों को जारी नियुक्ति पत्रों में पहले से स्पष्ट किया गया था कि उनकी नियुक्ति सीआईडी जांच के परिणाम के अधीन रहेगी। सरकार के अनुसार, जांच में जब पूरी परीक्षा प्रक्रिया प्रभावित होने से जुड़े तथ्य सामने आए, तो राज्य कैबिनेट ने परीक्षा रद्द करने का निर्णय लिया।
JSSC-CGL परीक्षा और इसके आधार पर हुई नियुक्तियों को रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गई हैं। पिछली सुनवाई में अदालत ने राज्य सरकार को काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया था। इसके बाद सरकार ने 42 पन्नों का जवाब दाखिल करते हुए परीक्षा रद्द करने के अपने फैसले का विस्तृत बचाव किया है।
सरकार का मूल तर्क है कि जब परीक्षा की पूरी प्रक्रिया ही कथित अनियमितताओं से प्रभावित पाई गई हो और निष्पक्ष अभ्यर्थियों तथा गड़बड़ी का लाभ लेने वालों की विश्वसनीय पहचान करना मुश्किल हो, तो केवल चुनिंदा अभ्यर्थियों पर कार्रवाई करने के बजाय पूरी परीक्षा रद्द करना कानूनी सिद्धांतों और जनहित के अनुरूप है।





