
रांची: झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की डिप्लोमा स्तरीय भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा (JDLCCE) में कथित गड़बड़ी की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, मामले की पुरानी कड़ियां भी सामने आने लगी हैं। इस प्रकरण में दिल्ली से गिरफ्तार किए गए अरुण कुमार को लेकर झारखंड सीआईडी को पूछताछ में कई अहम जानकारियां मिली हैं। जांच में उसकी पुरानी पृष्ठभूमि और झारखंड की भर्ती परीक्षा में कथित गड़बड़ी के बीच एक महत्वपूर्ण कनेक्शन सामने आया है।
जांच एजेंसी के अनुसार, अरुण कुमार पहले बिहार सिपाही भर्ती से जुड़े एक मामले में 14.3 करोड़ रुपये के गबन के आरोप में जेल जा चुका था। आरोप है कि जेल में रहने के दौरान उसकी पहचान कुछ ऐसे लोगों से हुई, जिनके साथ मिलकर बाद में झारखंड में नियुक्ति परीक्षा को प्रभावित करने की कथित योजना तैयार की गई।
मामले की सबसे अहम कड़ी वर्ष 2022 की जांच से जुड़ी है। करीब चार साल पहले JSSC डिप्लोमा स्तरीय भर्ती परीक्षा से संबंधित मामले में हुई एक गिरफ्तारी के बाद आरोपी अभिषेक से पुलिस ने पूछताछ की थी। पुलिस सूत्रों के अनुसार, पूछताछ में अभिषेक ने अरुण कुमार की बिहार से जुड़ी पृष्ठभूमि, उसके जेल जाने और जमानत मिलने की परिस्थितियों के साथ-साथ झारखंड में उसे मिले काम से संबंधित कई जानकारियां दी थीं।
बताया जाता है कि यह जानकारी उस समय की केस डायरी में भी दर्ज की गई थी। इसके बावजूद अरुण कुमार की गिरफ्तारी तत्काल नहीं हो सकी। अब अगस्त 2026 में सीआईडी ने उसे दिल्ली से गिरफ्तार किया है। पूछताछ के दौरान अरुण से भी इस पूरे नेटवर्क और कथित परीक्षा गड़बड़ी को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलने की बात सामने आ रही है।
जांच में अरुण कुमार की पृष्ठभूमि बिहार सिपाही भर्ती से जुड़े एक पुराने मामले तक पहुंचती है। वर्ष 2017-18 और 2018-19 में बिहार केंद्रीय चयन पर्षद (सिपाही भर्ती) यानी CSBC की भर्ती प्रक्रिया से संबंधित टेंडर एक निजी कंपनी को मिला था।
आरोप है कि इस प्रक्रिया में अभ्यर्थियों से आवेदन शुल्क के तौर पर प्राप्त राशि में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता हुई थी। इसी मामले में अरुण कुमार के खिलाफ कार्रवाई हुई और उसे जेल भेजा गया था। बताया जा रहा है कि इसी प्रकरण में 14.3 करोड़ रुपये के गबन का आरोप उसके खिलाफ था।
जेल में रहने के दौरान ही उसकी मुलाकात एक अन्य आरोपी अभिषेक से हुई। अभिषेक उस समय पटना हाईकोर्ट में सेक्शन ऑफिसर के पद पर कार्यरत बताया गया है। हाईकोर्ट से संबंधित कानूनी प्रक्रिया के दौरान दोनों के बीच संपर्क बढ़ा और यहीं से कथित तौर पर झारखंड में भर्ती परीक्षाओं को प्रभावित करने की योजना की नींव पड़ी।
जांच सूत्रों के अनुसार, अरुण कुमार को हाईकोर्ट से जमानत हासिल करने के लिए गबन की कथित कुल राशि का एक हिस्सा जमा करना पड़ा था। इसके बाद वह जेल से बाहर आया।
आरोप है कि जेल और जमानत की प्रक्रिया के दौरान बने संपर्क का इस्तेमाल बाद में झारखंड में भर्ती परीक्षा से जुड़े काम हासिल करने और उसे प्रभावित करने के लिए किया गया। जांच एजेंसी अब इस बात की पड़ताल कर रही है कि अरुण और उसके संपर्क में आए अन्य लोगों के बीच किस स्तर पर बातचीत हुई और इसमें कौन-कौन लोग शामिल थे।
जांच में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई है। बिहार में वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों का सामना कर चुके अरुण कुमार की कंपनी को बाद में JSSC की डिप्लोमा स्तरीय भर्ती परीक्षा से संबंधित काम मिला।
आरोप है कि परीक्षा से जुड़ा टेंडर हासिल करने में भारी खर्च होने का हवाला देकर अभ्यर्थियों से अवैध तरीके से रकम वसूलने की योजना तैयार की गई। इसके लिए कथित तौर पर परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने और अभ्यर्थियों से मोटी रकम लेने का नेटवर्क तैयार किया गया।
यानी जांच एजेंसी अब इस पहलू को भी खंगाल रही है कि परीक्षा से जुड़ी व्यवस्था में प्रवेश मिलने के बाद किस तरह कथित तौर पर प्रश्नपत्र लीक और पैसों की वसूली की योजना को अंजाम देने की कोशिश की गई।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल अब अरुण कुमार की गिरफ्तारी को लेकर उठ रहा है। यदि पुलिस को वर्ष 2022 में ही पूछताछ के दौरान अरुण की पृष्ठभूमि और झारखंड की भर्ती परीक्षा से उसके कथित संबंधों की जानकारी मिल गई थी और यह जानकारी केस डायरी में दर्ज भी थी, तो फिर उसकी गिरफ्तारी करीब चार साल बाद क्यों हुई?
अब सीआईडी की कार्रवाई के बाद जांच एजेंसी के सामने ऐसे तथ्य दोबारा आ रहे हैं, जिनका एक हिस्सा कथित तौर पर पहले की जांच में ही सामने आ चुका था। इससे जांच की दिशा, कार्रवाई में हुई देरी और पुराने इनपुट पर आगे की कार्रवाई नहीं होने को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।





