रिपब्लिकन सांसदों ने भी दिया समर्थन, प्रतिनिधि सभा में प्रस्ताव पारित होने से बढ़ा राजनीतिक दबाव
वॉशिंगटन: ईरान को लेकर जारी सैन्य तनाव के बीच अमेरिका की आंतरिक राजनीति में भी टकराव खुलकर सामने आने लगा है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) में एक प्रस्ताव पारित किया गया है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों को सीमित करना बताया जा रहा है। इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद अमेरिकी राजनीति में नई बहस छिड़ गई है।
मतदान के दौरान प्रस्ताव को 215-208 मतों से समर्थन मिला। विशेष बात यह रही कि कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी अपनी पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग जाकर डेमोक्रेट सांसदों का समर्थन किया। इससे यह संकेत मिला कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य कार्रवाई जैसे मुद्दों पर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी अलग-अलग राय उभर रही है।
युद्ध शक्तियों को लेकर बढ़ी बहस
डेमोक्रेट सांसदों का कहना है कि किसी भी बड़े सैन्य अभियान के लिए कांग्रेस की भूमिका और मंजूरी महत्वपूर्ण है। उनका तर्क है कि संविधान के तहत युद्ध संबंधी निर्णयों में विधायिका की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। इसी को ध्यान में रखते हुए युद्ध संबंधी शक्तियों को लेकर प्रस्ताव पेश किया गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मुद्दे ने अमेरिका में राष्ट्रपति और कांग्रेस की शक्तियों के बीच संतुलन को लेकर एक बार फिर बहस तेज कर दी है।
क्या है वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन
यह प्रस्ताव ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन’ के रूप में जाना जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना अमेरिका लंबे समय तक किसी सैन्य संघर्ष में शामिल न रहे। हालांकि इस प्रकार के प्रस्ताव को आगे की प्रक्रिया से भी गुजरना पड़ता है और इसे अंतिम कानूनी स्वरूप मिलने से पहले कई चरणों से गुजरना होता है।
रिपब्लिकन पार्टी में भी दिखे मतभेद
ईरान नीति और सैन्य कार्रवाई को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी मतभेद देखने को मिले हैं। कुछ सांसदों ने राष्ट्रपति के फैसलों पर सवाल उठाए हैं, जबकि कुछ नेताओं ने राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर पर्याप्त अधिकार देने की वकालत की है।
स्पीकर ने जताई चिंता
प्रतिनिधि सभा के नेतृत्व से जुड़े नेताओं ने राष्ट्रपति की शक्तियों पर प्रतिबंध लगाने के प्रयासों को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि ऐसे कदम अमेरिका की कूटनीतिक स्थिति और रणनीतिक क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रस्ताव पारित होने के बाद भले ही तत्काल कानूनी प्रभाव न पड़े, लेकिन इससे राजनीतिक स्तर पर दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है।
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