
ग्राम्य जीवन और मानवीय मूल्यों पर आधारित कालजयी कहानियों के विरासत से रूबरू हुए बच्चे
राज्य संपोषित +2 उच्च विद्यालय, पटमदा, नन्हें रचनाकार एवं निश्चय फाउंडेशन का संयुक्त आयोजन
पटमदा : साहित्य से जुड़ाव व रुचि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण व सामाजिक चेतना विकसित करने में बड़ी भूमिका निभाता है। बच्चों में साहित्यिक अभिरुचि को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राज्य संपोषित +2 उच्च विद्यालय, पटमदा में कथासम्राट प्रेमचंद के कहानियों का पाठ नन्हें रचनाकार क्लब के बच्चों के द्वारा किया गया। बच्चों की आवाज में कथासम्राट प्रेमचंद की कहानी का वाचन देखते ही बन रहा था।

प्रेमचंद की कहानी “पूस की रात” भारत के ग्राम्य जीवन, किसान परिवार के संघर्ष, मानव एवं पालतू जानवरों के सहजीवन, साहूकारी प्रथा के दंश व अन्य भावनाओं को बड़े ही सहज भाषा में बतलाती है।

वही कहानी “ठाकुर का कुआं” समाज में हाशिए पर रह रहे समुदायों के संघर्ष व मजबूरियों को बयान करता है। कथासम्राट प्रेमचंद स्मृति कार्यक्रम की शुरुआत प्रार्थना सभा के दौरान प्रधानाध्यक डॉ मिथिलेश कुमार के संबोधन से हुआ, प्रधानाध्यक डॉ मिथिलेश कुमार ने प्रेमचंद जी की सम्पूर्ण जीवनी को विस्तार से बताते हुए बच्चों को साहित्य से जुड़ने और समय का रचनात्मक सदुपयोग करने की सीख दी।

मौके पर उपस्थित सामाजिक संस्था निश्चय फाउंडेशन के संस्थापक तरुण कुमार ने बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि कथासम्राट प्रेमचंद जी ने अपने 56 वर्ष के जीवन काल में लगभग 300 कालजयी कहानियों, 15 उपन्यास और 3 नाटकों की रचना की थी, बनारस के नजदीक लमही गांव में आज भी रचनाओं के सुगंध को महसूस किया जा सकता है। विद्यालय के ज्यादातर बच्चे ग्रामीण पृष्ठभूमि से है, जो जंगलों और प्रकृति के समीप जीवनयापन करते है, आप सभी भी अपने नियमित प्रयासों से अच्छे रचनाकार बन सकते है।

मौके पर लिटिल इप्टा लाइब्रेरी से आई प्रेमचंद के कथा संग्रह मानसरोवर व अन्य किताबों को भी बच्चों के समक्ष प्रस्तुत किया गया। किताबों 400 से ज्यादा छात्र – छात्राएं और शिक्षकगण मुख्य रूप से उपस्थित है। बताते चले कि बच्चों में साहित्यिक अभिरुचि, भाषा के प्रति रुचि जगाने और किताब पढ़ने की आदत विकसित करने के उद्देश्य से विद्यालय में नन्हें रचनाकार क्लब का भी संचालन पिछले कई वर्षों से सामाजिक संस्था निश्चय फाउंडेशन एवं विद्यालय परिवार के संयुक्त प्रयास से किया जाता है।




