
मुंबई/नई दिल्ली: टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के फरवरी 2027 के बाद चेयरमैन पद पर बने रहने की इच्छा नहीं जताने के फैसले के बाद टाटा समूह में हलचल तेज हो गई है। अब मामला सिर्फ उत्तराधिकारी चुनने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि टाटा संस के बोर्ड के भीतर भी इस फैसले को लेकर अलग-अलग राय सामने आने लगी है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, टाटा संस के कुछ डायरेक्टर इस बात पर विचार कर रहे हैं कि चंद्रशेखरन के दोबारा नियुक्ति नहीं लेने के फैसले पर बोर्ड की औपचारिक प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। कुछ सदस्यों का मानना है कि चंद्रशेखरन को अपने फैसले पर एक बार फिर विचार करने के लिए कहा जाना चाहिए।
बोर्ड में वोटिंग को लेकर भी मतभेद
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चंद्रशेखरन के फैसले पर बोर्ड में वोटिंग कराई जाए। हालांकि, इस तरह के व्यक्तिगत फैसले पर बोर्ड स्तर पर वोटिंग होना असामान्य माना जा रहा है। मामले से जुड़े लोगों के मुताबिक, बोर्ड के भीतर इस मुद्दे पर चर्चा जरूर हुई है, लेकिन वोटिंग की संभावना फिलहाल कम है।
टाटा संस के बोर्ड में कुल छह डायरेक्टर हैं। इनमें चेयरमैन के अलावा दो ट्रस्ट नॉमिनी भी शामिल हैं। ऐसे में बोर्ड की मौजूदा स्थिति और ट्रस्टों की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने दिया उत्तराधिकारी प्रक्रिया पर जोर
रिपोर्ट के अनुसार, टाटा संस के प्रमुख शेयरहोल्डर ट्रस्टों में से एक सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने बोर्ड को पत्र लिखकर चंद्रशेखरन के फैसले पर ध्यान देने और नए चेयरमैन के चयन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए सिलेक्शन कमिटी गठित करने का सुझाव दिया है।
ट्रस्ट से जुड़े एक अधिकारी के मुताबिक, जब चेयरमैन ने दोबारा नियुक्ति नहीं लेने का संकेत दे दिया है, तो अब बोर्ड की प्राथमिक जिम्मेदारी उत्तराधिकार योजना तैयार करने की होनी चाहिए।
AGM पर भी संकट के बादल
इसी बीच टाटा संस की AGM को लेकर भी पेच फंसता नजर आ रहा है। 18 अगस्त को होने वाली AGM में कोरम पूरा होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की ओर से प्रतिनिधि नामित करने की स्थिति स्पष्ट नहीं होने पर बैठक प्रभावित हो सकती है।
अगर AGM को कोरम के अभाव में रद्द करना पड़ता है, तो यह टाटा संस के इतिहास में पहली ऐसी घटना हो सकती है।
दिल्ली में बैठकों ने बढ़ाई अटकलें
चंद्रशेखरन के फैसले के बीच टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और एन. चंद्रशेखरन की दिल्ली में अलग-अलग बैठकों को लेकर भी अटकलें तेज हैं। चर्चा है कि एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री ने चंद्रशेखरन से उनके फैसले पर दोबारा विचार करने को कहा है। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि सामने नहीं आई है।
क्या चंद्रशेखरन फैसला बदलेंगे?
मामले से जुड़े एक डायरेक्टर के मुताबिक, चंद्रशेखरन के फैसले पर औपचारिक वोटिंग की संभावना कम है। बोर्ड की ओर से उनसे अनुरोध या बातचीत के जरिए फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा जा सकता है, लेकिन उनके व्यक्तिगत निर्णय को वोटिंग के जरिए बदलना आसान नहीं होगा।
कैपस्टोन लीगल के मैनेजिंग पार्टनर आशीष के. सिंह के मुताबिक, अगर कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में कोई विशेष प्रावधान नहीं है, तो इस्तीफे या दोबारा नियुक्ति नहीं लेने के फैसले के लिए बोर्ड की मंजूरी जरूरी नहीं होती। उनके अनुसार, कंपनीज एक्ट के तहत बोर्ड के सामने ऐसे फैसले को स्वीकार करने के अलावा सीमित विकल्प होते हैं।
फिलहाल टाटा संस के सामने सबसे बड़ी चुनौती नेतृत्व परिवर्तन को सुचारू तरीके से पूरा करना है। चंद्रशेखरन के अचानक सामने आए फैसले ने उत्तराधिकार की प्रक्रिया को उम्मीद से पहले सक्रिय कर दिया है और अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वे अपने फैसले पर कायम रहते हैं या टाटा समूह के भीतर चल रही चर्चाओं के बीच कोई नया फैसला लेते हैं।





