
रांची: पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत कब हुई, इस सवाल को लेकर वैज्ञानिकों को झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र में हुई एक महत्वपूर्ण खोज से नई दिशा मिल सकती है। शोधकर्ताओं ने करीब 3.5 अरब वर्ष पुरानी कार्बन-समृद्ध चर्ट चट्टान की पहचान की है, जिसमें शुरुआती सूक्ष्मजीवी जीवन के संभावित जैव-संकेत मिले हैं। यह चट्टान जमशेदपुर से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण में भीतरदारी गांव के पास मिली है।
इस खोज से जुड़े अध्ययन को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल Proceedings of the National Academy of Sciences (PNAS) में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, चट्टान में संरक्षित रासायनिक और संरचनात्मक संकेत इस संभावना को मजबूत करते हैं कि पृथ्वी के बेहद शुरुआती दौर में ही सूक्ष्मजीवी समुदाय कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बनिक पदार्थ में बदलने की क्षमता विकसित कर चुके थे।
वैज्ञानिकों ने चट्टान में मौजूद जिरकॉन क्रिस्टलों की यूरेनियम-सीसा (U-Pb) डेटिंग की। इस विश्लेषण के आधार पर चट्टान की उम्र करीब 3.497 अरब वर्ष निर्धारित की गई है। इस खोज की सबसे अहम विशेषता यह है कि संभावित जैव-संकेत वाली चट्टान की उम्र निर्धारित करने के लिए उसी भूवैज्ञानिक संरचना से जुड़े जिरकॉन का इस्तेमाल किया गया। इससे वैज्ञानिकों को चट्टान के निर्माण के समय और उसमें मौजूद संभावित जैविक संकेतों के बीच संबंध समझने में महत्वपूर्ण मदद मिलती है।
अध्ययन के दौरान चट्टान में सिलिका और कार्बन-समृद्ध पदार्थ की बारी-बारी से बनी बेहद पतली परतें देखी गईं। शोधकर्ताओं के अनुसार, इनकी संरचना प्राचीन माइक्रोबियल मैट्स से मिलती-जुलती है।
माइक्रोबियल मैट सूक्ष्मजीवों का ऐसा समुदाय होता है, जो किसी सतह पर कालीन जैसी परत बनाकर रह सकता है। इसमें मुख्य रूप से बैक्टीरिया और आर्किया जैसे सूक्ष्मजीव शामिल हो सकते हैं। समय के साथ इन समुदायों के अवशेष तलछट की परतों में संरक्षित हो सकते हैं और करोड़ों-अरबों वर्ष बाद चट्टानों में उनके संकेत दिखाई दे सकते हैं।
हालांकि केवल चट्टान में कार्बन की मौजूदगी को जीवन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसलिए वैज्ञानिकों ने यह पता लगाने के लिए कार्बन के समस्थानिक अनुपात और उसकी आणविक संरचना का भी विश्लेषण किया कि यह पदार्थ जैविक गतिविधि से बना था या बाद में हुई भूगर्भीय प्रक्रियाओं का परिणाम है।
विश्लेषण में कार्बन-13 की तुलना में कार्बन-12 की अपेक्षाकृत अधिक मात्रा पाई गई। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस तरह का समस्थानिक पैटर्न जैविक कार्बन स्थिरीकरण से जुड़ी प्रक्रियाओं के अनुरूप है।
इन्हीं रासायनिक संकेतों के आधार पर शोध दल ने चट्टान में मौजूद कार्बनयुक्त पदार्थ की उत्पत्ति को जैविक (Biogenic) माना है।
अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, करीब 3.5 अरब वर्ष पहले ही पृथ्वी पर मौजूद कुछ सूक्ष्मजीव कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बनिक पदार्थ में बदलने की प्रक्रिया अपना चुके थे।
कोलकाता स्थित भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की वैज्ञानिक और शोध दल की सदस्य त्रिस्रोता चौधरी के अनुसार, चट्टान में संरक्षित रासायनिक संकेत इस ओर इशारा करते हैं कि 3.5 अरब वर्ष पहले तक जीवन के शुरुआती रूप कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बनिक पदार्थ में बदलने के अपेक्षाकृत विकसित तरीके अपना चुके थे।
सिंहभूम क्रेटन का भूवैज्ञानिक इतिहास इस खोज को और महत्वपूर्ण बनाता है। इस क्षेत्र में प्राचीन समुद्री और ज्वालामुखीय गतिविधियों के प्रमाण मिलते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि शुरुआती पृथ्वी पर ज्वालामुखीय और हाइड्रोथर्मल प्रणालियां सूक्ष्मजीवी जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध करा सकती थीं। ऐसे वातावरण में गर्मी, खनिज और रासायनिक ऊर्जा मौजूद रहती थी, जो शुरुआती माइक्रोबियल पारिस्थितिकी तंत्र के विकास में भूमिका निभा सकती थी।
प्राचीन समुद्री प्रणालियों में लौह और सिलिका की पर्याप्त मात्रा तथा ज्वालामुखीय गतिविधियों से जुड़े रासायनिक तत्व मौजूद रहे होंगे। ऐसे वातावरण को पृथ्वी पर शुरुआती जीवन के विकास के संभावित ठिकानों में माना जाता है।
पृथ्वी का निर्माण लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले हुआ था। यदि सिंहभूम की इस चट्टान में मिले जैव-संकेतों की व्याख्या आगे के अध्ययनों में भी सही साबित होती है, तो इसका अर्थ होगा कि पृथ्वी के अस्तित्व में आने के करीब 1.1 अरब वर्ष के भीतर ही सूक्ष्मजीवी गतिविधियां मौजूद थीं।
यह समय भूवैज्ञानिक दृष्टि से बेहद शुरुआती दौर था। उस समय पृथ्वी आज की तरह ऑक्सीजन-समृद्ध नहीं थी और उसका वातावरण तथा महासागर वर्तमान से काफी अलग थे।
पृथ्वी पर शुरुआती जीवन के संभावित प्रमाण इससे पहले भी कई जगहों से सामने आ चुके हैं। ग्रीनलैंड, क्यूबेक, दक्षिण अफ्रीका और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की बेहद प्राचीन चट्टानों में भी ऐसे रासायनिक या संरचनात्मक संकेत मिले हैं, जिन्हें वैज्ञानिकों ने संभावित जैव-साक्ष्य के रूप में देखा है।
हालांकि, इन दावों को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में लंबे समय से बहस होती रही है। इसकी वजह यह है कि अरबों वर्ष पुरानी चट्टानों में मौजूद रासायनिक संकेत कभी-कभी जैविक गतिविधि के बजाय बाद में हुई भूगर्भीय प्रक्रियाओं से भी बन सकते हैं।
झारखंड की इस खोज को खास बनाने वाली बात चट्टान की उम्र निर्धारित करने की प्रक्रिया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, संभावित जैव-संकेत वाली चर्ट से जुड़े जिरकॉन क्रिस्टलों की U-Pb डेटिंग से करीब 3.497 अरब वर्ष की उम्र मिली। इसके मुकाबले कुछ अन्य प्राचीन स्थलों पर मिले संभावित जैविक अवशेषों की उम्र आसपास की चट्टानों के आधार पर निर्धारित की गई थी। इसलिए सिंहभूम की चट्टान से जुड़े प्रत्यक्ष डेटिंग साक्ष्य शुरुआती जीवन की समय-सीमा समझने में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
हालांकि शोधकर्ताओं ने इसे अपनी जानकारी के अनुसार सबसे पुरानी सीधे डेट की गई ऐसी चट्टान बताया है, जिसमें पुष्ट जैव-संकेत मौजूद हैं, लेकिन इस दावे को लेकर आगे स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच जरूरी होगी।
वैज्ञानिकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि जिरकॉन से प्राप्त उम्र वास्तव में चर्ट के निर्माण काल को दर्शाती है। साथ ही यह भी जांचना होगा कि चट्टान में मौजूद कार्बन के समस्थानिक और आणविक संकेतों को निर्णायक रूप से जैविक गतिविधि से जोड़ा जा सकता है या नहीं।
यही वजह है कि यह खोज बेहद महत्वपूर्ण होने के बावजूद इसे पृथ्वी पर जीवन का सबसे पुराना निर्विवाद प्रमाण मानने से पहले और प्रमाणों की जरूरत होगी।
वैज्ञानिकों ने इससे पहले 3.7 अरब वर्ष या उससे भी पुराने जीवन के संभावित प्रमाणों का दावा किया है, खासकर ग्रीनलैंड और क्यूबेक की कुछ प्राचीन चट्टानों में। लेकिन उन खोजों की व्याख्या को लेकर अभी भी वैज्ञानिक मतभेद मौजूद हैं।
पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर) की नई खोज इसी व्यापक वैज्ञानिक बहस में एक महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ती है। यदि आगे के अध्ययन इसके जैविक संकेतों और डेटिंग की पुष्टि करते हैं, तो यह पृथ्वी पर जीवन के शुरुआती विकास और उस समय मौजूद पर्यावरण को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।







