
Health Tips: लंबे समय तक लिवर की बीमारी को शराब के सेवन से जोड़कर देखा जाता रहा है। डॉक्टर से लेकर आम लोगों तक अक्सर लिवर की समस्या सामने आने पर पहला सवाल यही होता है कि मरीज शराब पीता है या नहीं। लेकिन अब लिवर की बीमारियों की तस्वीर तेजी से बदल रही है। बड़ी संख्या में ऐसे मरीज सामने आ रहे हैं, जिन्होंने कभी शराब का सेवन नहीं किया, फिर भी वे फैटी लिवर, फाइब्रोसिस और यहां तक कि सिरोसिस जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं।
लिवर विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे शराब से ज्यादा मेटाबॉलिक हेल्थ यानी शरीर के चयापचय से जुड़ी गड़बड़ियां जिम्मेदार हो सकती हैं। नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD), जिसे अब मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) के नाम से भी जाना जाता है, दुनियाभर में क्रॉनिक लिवर डिजीज की एक बड़ी वजह बनकर उभर रही है।
बिना लक्षण के बढ़ती रहती है बीमारी
फैटी लिवर की सबसे बड़ी चुनौती इसका शुरुआती दौर में खामोश रहना है। ज्यादातर मरीजों में शुरुआत में न तो दर्द होता है और न ही कोई ऐसा स्पष्ट लक्षण दिखाई देता है, जिससे वे तुरंत डॉक्टर के पास जाएं। कई बार रूटीन हेल्थ चेकअप, अल्ट्रासाउंड या किसी दूसरी बीमारी की जांच के दौरान फैटी लिवर का पता चलता है।
समस्या यह है कि जब तक बीमारी का पता चलता है, कुछ मरीजों में लिवर में सूजन और फाइब्रोसिस यानी स्कारिंग की प्रक्रिया शुरू हो चुकी होती है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर सिरोसिस और अंतिम चरण की लिवर बीमारी का खतरा बढ़ सकता है।
शराब नहीं, मेटाबॉलिक गड़बड़ी भी हो सकती है वजह
विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक जीवनशैली ने फैटी लिवर के जोखिम को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लंबे समय तक बैठे रहना, शारीरिक गतिविधि की कमी, अत्यधिक प्रोसेस्ड और कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन, अनियमित खान-पान, तनाव और नींद की कमी शरीर के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकती है।
इस पूरी प्रक्रिया में इंसुलिन रेजिस्टेंस की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। जब शरीर इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाता है, तो लिवर में अतिरिक्त वसा जमा होने की स्थिति बन सकती है। समय के साथ यह सूजन और फाइब्रोसिस में बदल सकती है और गंभीर मामलों में सिरोसिस तक पहुंच सकती है।
पतले लोगों को भी हो सकता है फैटी लिवर
फैटी लिवर को केवल मोटापे से जोड़ना भी सही नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे लोग भी इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं जिनका वजन सामान्य दिखाई देता है। इसे आमतौर पर ‘लीन फैटी लिवर’ कहा जाता है।
ऐसे लोगों में शरीर के अंदर यानी पेट के आसपास अधिक आंतरिक वसा, इंसुलिन रेजिस्टेंस या अन्य मेटाबॉलिक असामान्यताएं मौजूद हो सकती हैं। भारतीय आबादी में यह समस्या विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है, इसलिए सिर्फ शरीर का वजन देखकर फैटी लिवर के जोखिम को खारिज नहीं किया जाना चाहिए।
डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से भी गहरा संबंध
फैटी लिवर केवल लिवर तक सीमित समस्या नहीं है। इसका संबंध टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, असामान्य कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड स्तर जैसी मेटाबॉलिक समस्याओं से भी देखा जाता है। महिलाओं में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) जैसी स्थितियों के साथ भी इसका संबंध हो सकता है।
यही वजह है कि विशेषज्ञ फैटी लिवर को केवल लिवर की बीमारी के बजाय पूरे शरीर के मेटाबॉलिक स्वास्थ्य का संकेतक मानने पर जोर देते हैं।
लिवर ट्रांसप्लांट के मामलों पर भी पड़ रहा असर
लिवर ट्रांसप्लांट विशेषज्ञों के अनुसार, फैटी लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारी के मामलों में बढ़ोतरी का असर भविष्य में लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत पर भी पड़ सकता है। फैटी लिवर से संबंधित सिरोसिस धीरे-धीरे अंतिम चरण की लिवर बीमारी और ट्रांसप्लांट के महत्वपूर्ण कारणों में शामिल हो रहा है।
शराब से संबंधित लिवर बीमारी की तुलना में मेटाबॉलिक लिवर डिजीज का प्रबंधन अधिक जटिल हो सकता है। इसमें लंबे समय तक वजन प्रबंधन, नियमित व्यायाम, संतुलित खान-पान और डायबिटीज, ब्लड प्रेशर व लिपिड जैसी समस्याओं को नियंत्रित करना जरूरी होता है।
समय पर जांच से रोकी जा सकती है गंभीर स्थिति
विशेषज्ञों का कहना है कि हाई-रिस्क लोगों में समय रहते जांच पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। खासकर डायबिटीज, पेट के आसपास अधिक चर्बी, हाई ब्लड प्रेशर, असामान्य लिपिड प्रोफाइल या अन्य मेटाबॉलिक जोखिम वाले लोगों में डॉक्टर की सलाह के अनुसार लिवर की जांच उपयोगी हो सकती है।
लिवर एंजाइम टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और फाइब्रोसिस के गैर-आक्रामक आकलन जैसे तरीकों से जोखिम का पता लगाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, हर मरीज के लिए जांच का तरीका और जरूरत अलग हो सकती है, इसलिए चिकित्सकीय सलाह जरूरी है।
वजन में 7-10 फीसदी कमी से मिल सकता है फायदा
फैटी लिवर के प्रबंधन में जीवनशैली में बदलाव की भूमिका बेहद अहम है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जिन मरीजों का वजन अधिक है, उनमें शरीर के वजन में लगभग 7-10 फीसदी की कमी लिवर की वसा, सूजन और कुछ मामलों में फाइब्रोसिस पर महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
इसके लिए नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार, कैलोरी का बेहतर प्रबंधन, पर्याप्त नींद और मेटाबॉलिक बीमारियों का नियंत्रण जरूरी है। सबसे बड़ी चुनौती इन बदलावों को लंबे समय तक बनाए रखना है।
‘शराब नहीं पीता’ कहकर निश्चिंत होने की जरूरत नहीं
विशेषज्ञों के अनुसार, फैटी लिवर को केवल एक सामान्य या संयोग से सामने आई समस्या समझना सही नहीं है। लिवर की खासियत है कि वह लंबे समय तक काफी नुकसान के बावजूद अपना काम करता रहता है। इसी वजह से लक्षणों की अनुपस्थिति हमेशा यह साबित नहीं करती कि लिवर पूरी तरह स्वस्थ है।
इसलिए फैटी लिवर को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी संकेत के तौर पर देखने की जरूरत है। शराब से दूरी निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन सिर्फ शराब न पीने से लिवर की बीमारी का जोखिम खत्म नहीं हो जाता। मेटाबॉलिक स्वास्थ्य, वजन, खान-पान और शारीरिक सक्रियता पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है।







