
जमशेदपुर:टुइलाडूंगरी स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारे में ‘बाबा जीवन सिंह लंगर हॉल’ के निर्माण कार्य को लेकर छिड़ा विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। जिसे मौजूदा व्यवस्था द्वारा शहर का “पहला और अभूतपूर्व ऐतिहासिक निर्माण” बताकर प्रचारित किया जा रहा था, पूर्व प्रबंधकों और स्थानीय संगत ने उस पर कड़ा एतराज जताते हुए इसे ‘तथ्यों की लीपापोती’ और ‘सस्ती वाहवाही लूटने की कोशिश’ करार दिया है। पूर्व पदाधिकारियों का सीधा आरोप है कि दशकों पुराने इतिहास और पूर्व कमेटियों के पसीने की कमाई को दरकिनार कर संगत की आंखों में धूल झोंकी जा रही है।
2014 में ही समर्पित हो चुका था हॉल, फिर नया दावा कैसा?
पूर्व प्रधान दास जसबीर सिंह पदरी ने पूरे मामले का कच्चा-चिट्ठा खोलते हुए बताया कि यह कोई आज की योजना नहीं है। वर्ष 2012 में प्रस्तावित इस हॉल की नींव 2013 में ही स्थानीय संगत, अकाली दल, तत्कालीन विधायक रघुवर दास और टाटा वर्कर्स यूनियन समेत तमाम औद्योगिक संगठनों की मौजूदगी में रखी गई थी।
दानदाताओं, स्त्री सभा और नौजवान सभा के सहयोग से वर्ष 2014 में यह हॉल पूरी तरह अस्तित्व में आ चुका था, जहां वर्षों से लंगर और धार्मिक समागम अनवरत चल रहे हैं। ऐसे में वर्षों से संचालित व्यवस्था को “नया और पहली बार हुआ कार्य” बताना न केवल हास्यास्पद है, बल्कि गुरुद्वारे के 70 साल पुराने इतिहास का अपमान भी है।
प्रतिशत का खेल: 80% काम पहले, श्रेय अब?
पूर्व प्रबंधकों के अनुसार, इस भवन की पहली मंजिल का 40% काम पूर्व प्रधान सुखदेव सिंह के कार्यकाल में हुआ, जबकि अगला 40% काम संगत द्वारा चुनी गई 5 सदस्यीय समिति ने पूरा कराया। यानी 80 फीसदी ढांचा पहले से खड़ा था।
आरोप है कि वर्तमान में पहली मंजिल की छत का करीब 20 से 25 प्रतिशत काम अभी भी लटका हुआ है, फिर भी महज बची हुई दीवारों पर ईंटें जुड़वाकर इसे सदी का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट बनाकर पेश किया जा रहा है।
सुरक्षा मानकों की अनदेखी और प्राथमिकताओं पर सवाल
संगत के प्रतिनिधियों ने निर्माण की तकनीकी गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं:
खतरनाक निर्माण शैली: छत का काम पूरा किए बिना पुरानी 3 फीट ऊंची दीवारों पर सीधे नई चिनाई की जा रही है, जो तकनीकी और सुरक्षा मानकों के खिलाफ है।
पारदर्शिता की कमी: खर्च और निर्माण प्रगति के वास्तविक आंकड़े संगत के सामने सार्वजनिक नहीं किए जा रहे।
संगत की दो टूक मांग
सच्चाई सामने लाने की मांग करते हुए पूर्व प्रबंधकों और संगत ने स्पष्ट किया है कि श्रेय की राजनीति बंद होनी चाहिए। उन्होंने मांग रखी है कि पुरानी कमेटियों के योगदान का सम्मान हो, बचे हुए 20-25% छत के काम को प्राथमिकता पर पूरा किया जाए और निर्माण से जुड़ा पाई-पाई का हिसाब संगत की कचहरी में निष्पक्षता से रखा जाए।




