
नई दिल्ली: जन्म एवं मृत्यु के पंजीकरण को लेकर नियम अब और सख्त होने जा रहे हैं। जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) अधिनियम, 2026 के प्रावधान 1 अक्टूबर 2026 से लागू होंगे। भारत के रजिस्ट्रार जनरल मृत्युंजय कुमार नारायण ने इसकी जानकारी दी है। नए कानून का मुख्य उद्देश्य जन्म और मृत्यु के पंजीकरण में होने वाली देरी को कम करना और समय पर पंजीकरण को बढ़ावा देना है।
संसद के दोनों सदनों से पारित जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 को पिछले महीने राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद कानून का रूप मिल गया था। इसके लागू होने के बाद निर्धारित समय के बाद जन्म या मृत्यु का पंजीकरण कराने की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक सख्त हो जाएगी।
एक साल से अधिक की देरी पर अधिकारी की मंजूरी जरूरी
नए प्रावधानों के अनुसार, यदि जन्म या मृत्यु की सूचना एक वर्ष से अधिक लेकिन दो वर्ष के भीतर रजिस्ट्रार को दी जाती है, तो उसका पंजीकरण केवल जिला मजिस्ट्रेट (DM), उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) या कार्यकारी मजिस्ट्रेट की मंजूरी के बाद ही किया जा सकेगा।
दो साल बाद कोर्ट के आदेश से होगा पंजीकरण
यदि जन्म या मृत्यु की सूचना दो वर्ष से अधिक समय बाद दी जाती है, तो पंजीकरण के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होगी। यानी दो साल से अधिक पुराने जन्म या मृत्यु के मामलों में केवल प्रशासनिक स्तर पर पंजीकरण नहीं कराया जा सकेगा।
देरी से पंजीकरण में सत्यापन अनिवार्य
संशोधित कानून में यह भी प्रावधान किया गया है कि विलंबित पंजीकरण की अनुमति देने से पहले संबंधित नामित प्राधिकारी को जन्म या मृत्यु की सूचना की प्रामाणिकता की पुष्टि करनी होगी। इससे फर्जी दस्तावेजों या गलत जानकारी के आधार पर देर से पंजीकरण कराने के मामलों पर रोक लगाने की कोशिश की गई है।
जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र का महत्व
जन्म और मृत्यु का पंजीकरण कानूनी और प्रशासनिक रिकॉर्ड के लिहाज से महत्वपूर्ण है। जन्म प्रमाण पत्र व्यक्ति की कानूनी पहचान और उम्र से जुड़े विभिन्न कार्यों में उपयोगी होता है, जबकि मृत्यु प्रमाण पत्र संपत्ति, उत्तराधिकार, पेंशन और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में काम करता है।
1 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले इन प्रावधानों के बाद लोगों के लिए जन्म और मृत्यु का समय पर पंजीकरण कराना और भी महत्वपूर्ण हो जाएगा।







