देश में कांग्रेस और कई विपक्षी पार्टियां ईवीएम मशीन से चुनाव में चुनाव आयोग और भारतीय जनता पार्टी पर हेरा फेरी का आरोप लगाती रही है और बीजेपी की जीत का असली चमत्कार ईवीएम को ही बताती रही है चाहे वह बिहार विधानसभा का चुनाव हो चाहे दिल्ली विधानसभा का चुनाव हो हरियाणा राजस्थान यूपी उत्तराखंड के चुनाव हो। इसी के बलबूते पर कांग्रेस वोट कर गद्दी छोड़कर नारा लगाती रही है और उसके लिए आंदोलन भी किया। पूरे देश में पिछले कई वर्षों से ईवीएम (EVM) बनाम बैलेट पेपर की बहस छिड़ी हुई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तो कई बार चुनाव आयोग पर भी सवाल खड़े किए हैं। इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाते हुए कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार ने एक बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाने का फैसला किया था-आगामी पंचायत चुनावों को बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स के जरिए कराने का राग अलाप रही थी लेकिन, झारखंड से आए चुनावी नतीजों का साइड इफेक्ट ऐसा हुआ कि अब कर्नाटक में बैलेट पेपर से चुनाव कराने की फैसले को बदलने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। कांग्रेस का गुब्बारा फूट गया है।
बैलेट पेपर से चुनाव कराने की हवा निकाली
झारखंड में हाल ही में 48 नगर निकायों के चुनाव हुए। खास बात यह थी कि ये चुनाव बैलेट पेपर से कराए गए थे। कांग्रेस को उम्मीद थी कि मतपत्रों के जरिए चुनाव होने पर बीजेपी का ‘जादू’ खत्म हो जाएगा और कांग्रेस की लहर दिखेगी। लेकिन जब शुक्रवार को नतीजे आए, तो कांग्रेस के पैरों तले जमीन खिसक गई। 48 सीटों में से भाजपा समर्थित 12 प्रत्याशियों ने बंपर जीत हासिल की, जबकि कांग्रेस समर्थित केवल दो उम्मीदवार ही अपनी साख बचा पाए। झामुमो भी महज छह सीटों पर सिमट गई। इन नतीजों ने साफ कर दिया कि जनता का समर्थन बैलेट पेपर पर भी बीजेपी के साथ ही है। अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर बैलेट पेपर पर भी हार ही मिलनी है, तो कर्नाटक में कांग्रेस सरकार इतनी मेहनत क्यों कर रही है?
कर्नाटक कैबिनेट का फैसला
कर्नाटक सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री प्रियांक खड़गे ने हाल ही में घोषणा की थी कि वे ग्राम स्वराज (संशोधन) विधेयक 2026 लाकर पंचायत चुनावों में बैलेट पेपर को अनिवार्य करेंगे। सरकार का तर्क था कि इससे चुनाव प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी। लेकिन झारखंड के नतीजों के बाद कर्नाटक कांग्रेस के भीतर ही विरोध की आवाजें उठने लगी हैं। पार्टी के कई विधायकों का मानना है कि बैलेट पेपर से चुनाव कराना न केवल खर्चीला है, बल्कि इससे मतगणना में देरी होती है और धांधली की आशंका भी बढ़ जाती है। झारखंड ने यह साबित कर दिया है कि ईवीएम को दोष देना सिर्फ एक बहाना था, असली चुनौती जमीन पर जनता का दिल जीतना है।
सिद्दारमैया सरकार के सामने ‘आगे कुआं, पीछे खाई’
अब मुख्यमंत्री सिद्दारमैया एक बड़ी दुविधा में हैं। अगर वे बैलेट पेपर के फैसले पर अडिग रहते हैं और पंचायत चुनाव में कांग्रेस हार जाती है, तो राहुल गांधी का पूरा ‘EVM विरोध’ वाला राष्ट्रीय एजेंडा ही खत्म हो जाएगा। वहीं, अगर वे फैसला बदलते हैं, तो विपक्ष उन्हें ‘यू-टर्न’ लेने वाली सरकार कहेगा। झारखंड के नतीजों ने बीजेपी को यह कहने का सुनहरा मौका दे दिया है कि “विपक्ष को ईवीएम से नहीं, बल्कि अपनी हार से दिक्कत है।” राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कर्नाटक कैबिनेट अब इस फैसले पर दोबारा विचार कर सकती है ताकि पंचायत चुनावों में होने वाली संभावित किरकिरी से बचा जा सके।









