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आकाश लोहार
गढ़वा
बेटी की शादी,एक पिता के लिए जिंदगी का सबसे खूबसूरत सपना होता है,लेकिन जब घर की आर्थिक हालत कमजोर हो,जेब खाली हो और सामने बेटी के हाथ पीले करने की जिम्मेदारी खड़ी हो,तब यही सपना कई परिवारों के लिए चिंता बन जाता है,किसी पिता की मजबूरी को समझने के लिए उसके घर की खामोशी पढ़नी पड़ती है,उस मां की आंखों को देखना पड़ता है,जो बेटी की शादी का सपना तो देखती है,लेकिन खर्च की चिंता में रात रात भर सो नहीं पाती,इन्हीं परिवारों की इसी चिंता को कम करने की कोशिश में जुटे हैं जानकी सामूहिक विवाह फाउंडेशन के सचिव रितेश तिवारी उर्फ महाकाल तिवारी,रितेश तिवारी के लिए समाजसेवा सिर्फ मंच पर भाषण देने या किसी कार्यक्रम में तस्वीर खिंचवाने का नाम नहीं है,उनका प्रयास है कि समाज के उस परिवार तक मदद पहुंचे,जहां जरूरत सबसे ज्यादा है,जहां बेटी की शादी के लिए साधन कम हैं,लेकिन सपने उतने ही बड़े हैं।
एक बेटी की शादी,सिर्फ एक परिवार की खुशी नहीं :- जानकी सामूहिक विवाह फाउंडेशन का उद्देश्य जरूरतमंद और गरीब बेटियों के विवाह में सहयोग करना है,फाउंडेशन के अध्यक्ष संजीव दुबे और सचिव रितेश तिवारी उर्फ महाकाल तिवारी के नेतृत्व में यह पहल लगातार आगे बढ़ रही है,फाउंडेशन की ओर से दहेज प्रथा,बाल विवाह और भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी जागरूकता फैलाने का प्रयास किया जा रहा है,क्योंकि सोच साफ है,बेटी बोझ नहीं है,बेटी किसी घर की खुशियों की वजह है और जब उसी बेटी की शादी आर्थिक मजबूरी के कारण रुकने लगे,तो समाज का दायित्व बनता है कि वह उसके परिवार के साथ खड़ा हो।
21 बेटियों के विवाह से बढ़ा भरोसा :- बाबा खोनहर नाथ मंदिर परिसर में आयोजित सामूहिक विवाह समारोह में 21 बेटियों का विवाह कराया गया,यह सिर्फ एक आयोजन नहीं था,बल्कि उन परिवारों के लिए उम्मीद का ऐसा पल था,जहां लंबे समय से बेटी की शादी को लेकर चिंता बनी हुई थी,विवाह के मंडप में जब बेटियों के हाथों में मेहंदी सजी,मांग में सिंदूर भरा और परिवार की आंखों में खुशी के आंसू आए,तो उस पल की खुशी को शब्दों में बयां करना आसान नहीं था,किसी पिता के चेहरे पर बेटी की विदाई की खुशी थी,तो किसी मां की आंखों में अपनी बेटी के नए जीवन की दुआ,यही वो पल हैं,जो समाजसेवा को सिर्फ एक शब्द नहीं रहने देते,बल्कि उसे इंसानियत का रूप देते हैं।
अब 51 बेटियों तक पहुंचाने का संकल्प :- 21 बेटियों के विवाह के बाद फाउंडेशन अब 51 बेटियों के सामूहिक विवाह की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है,रितेश तिवारी का प्रयास है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों को शादी के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने की मजबूरी न हो,दहेज जैसी सामाजिक कुरीति के खिलाफ समाज में संदेश जाए और जरूरतमंद परिवारों को यह महसूस हो कि मुश्किल वक्त में वे अकेले नहीं हैं,उनकी सोच यही है कि समाज में बदलाव केवल बड़े-बड़े भाषणों से नहीं आता,बदलाव तब आता है,जब किसी जरूरतमंद के घर तक मदद पहुंचती है।
सेवा सिर्फ विवाह तक सीमित नहीं :- जानकी सामूहिक विवाह फाउंडेशन की गतिविधियां केवल सामूहिक विवाह तक सीमित नहीं हैं,जरूरतमंदों के बीच भोजन वितरण,गरीब परिवारों की सहायता और विपरीत परिस्थितियों में पीड़ित लोगों तक सहयोग पहुंचाने जैसे कार्य भी किए जाते रहे हैं,यानी एक तरफ बेटियों के विवाह की जिम्मेदारी उठाने की कोशिश,तो दूसरी तरफ जरूरतमंद इंसानों के बीच खड़े होने का प्रयास,यही वजह है कि रितेश तिवारी उर्फ महाकाल तिवारी की पहचान एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में लगातार मजबूत हो रही है।
किसी के लिए आयोजन,किसी के लिए जिंदगी की नई शुरुआत :- दरअसल,सामूहिक विवाह का मंच किसी के लिए भले ही एक कार्यक्रम हो,लेकिन उस गरीब परिवार के लिए यह उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन होता है,जिस पिता को कभी बेटी की शादी के खर्च की चिंता सताती थी,उसी पिता के चेहरे पर जब बेटी की विदाई के समय मुस्कान आती है,तो शायद यही किसी भी समाजसेवा की सबसे बड़ी सफलता होती है और शायद इसी भावना के साथ जानकी सामूहिक विवाह फाउंडेशन आगे बढ़ रहा है,क्योंकि समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं,जो सिर्फ अपने घर का चूल्हा जलते हुए नहीं देखना चाहते,वे चाहते हैं कि उनके आसपास के हर जरूरतमंद घर में भी खुशियों का दिया जले।
रितेश तिवारी उर्फ महाकाल तिवारी का यह प्रयास भी उसी सोच की एक तस्वीर है :- जहां किसी गरीब पिता की आंखों में बेटी की शादी की चिंता दिखाई दे,वहां मदद का हाथ बढ़े,जहां किसी बेटी के सपने आर्थिक मजबूरी से छोटे पड़ने लगें,वहां समाज उसके साथ खड़ा हो और जहां दहेज के नाम पर रिश्तों की कीमत लगाई जाती हो,वहां बिना दहेज सम्मान के साथ बेटी की विदाई हो।
यही संदेश लेकर जानकी सामूहिक विवाह फाउंडेशन अपने सफर को आगे बढ़ा रहा है :- क्योंकि बेटी की विदाई सिर्फ एक घर से नहीं होती,उसके साथ एक पिता का सपना,एक मां की दुआ और पूरे परिवार की उम्मीदें भी विदा होती हैं और जब उस विदाई में समाज का सहयोग जुड़ जाए, तो बेटी सिर्फ अपने नए घर नहीं जाती,बल्कि अपने साथ यह विश्वास लेकर जाती है कि मुश्किल वक्त में समाज उसके साथ खड़ा है।






