चक्रधरपुर: शहर में ठंड का कहर लगातार बढ़ता जा रहा है और इसी कड़ाके की ठंड ने एक खानाबदोश दंपति की जान ले ली। रेलवे स्टेशन के पास प्लास्टिक टांगकर रहने वाले दीन-दुखियों में शामिल इस जोड़े की मौत ने स्थानीय लोगों को झकझोर दिया है।
जानकारी के मुताबिक, दंपति कई दिनों से खुले आसमान के नीचे प्लास्टिक के सहारे रात गुज़ार रहा था। पिछले कुछ दिनों से पड़ रही तेज़ सर्दी से बचने के लिए उनके पास कोई गर्म कपड़ा या आग का इंतज़ाम नहीं था। इसी कारण पहले पत्नी बीमार पड़ी और उसकी हालत बिगड़ गई।
पहले पत्नी की अस्पताल में मौत, अगले दिन पति भी ठिठुरकर चला गया
स्थानीय वार्ड पार्षद सोमनाथ रजक को जब महिला की गंभीर हालत की सूचना मिली तो उन्होंने मानवीयता दिखाते हुए उसे चक्रधरपुर अनुमंडल अस्पताल में भर्ती कराया। लेकिन उपचार के दौरान ही महिला ने दम तोड़ दिया। पार्षद ने स्वयं उसका अंतिम संस्कार भी करवाया।
दुखद बात यह है कि पत्नी की मौत के अगले ही दिन उसके पति की भी ठंड से मौत हो गई। वह उसी प्लास्टिक के नीचे रात गुजार रहा था, जहां दंपति पिछले कई दिनों से रह रहा था।
स्थानीय लोगों का कहना है कि ठंड बढ़ने के बाद भी गरीबों के लिए न अलाव की व्यवस्था की गई और न ही किसी प्रकार का अस्थायी आश्रय उपलब्ध कराया गया। इसी लापरवाही का परिणाम रहा कि दंपति ठंड की चपेट में आ गया।
वार्ड पार्षद सोमनाथ रजक ने कहा, तेजी से मौसम बदल रहा है और गरीबों को इससे सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। प्रशासन को तुरंत व्यवस्था सुधारनी चाहिए, वरना हालात और बिगड़ सकते हैं।
पहचान नहीं हो पाई, खानाबदोश जीवन था
दंपति की पहचान अब तक नहीं हो सकी है। वे चक्रधरपुर क्षेत्र में खानाबदोश जीवन जी रहे थे और अक्सर अलग-अलग स्थानों पर अपना प्लास्टिक टांगकर रहते थे। स्थानीय लोग बताते हैं कि दोनों पिछले कई दिनों से पांच माइल क्षेत्र में भीख मांगकर गुज़ारा कर रहे थे।
प्रशासन की उदासीनता पर सवाल
क्षेत्रवासियों के अनुसार, चक्रधरपुर में न अलाव की व्यवस्था है और न ही ठंड से बचाने के लिए कोई राहत केंद्र। गरीबों को खुले आसमान तले कांपते हुए पूरी रात बिताने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
सोमनाथ रजक ने प्रशासन से मांग की है कि, ठंड से बेहाल गरीबों को राहत दिलाने के लिए तुरंत कदम उठाए जाएं। यह गंभीर मानवीय संकट है।
झारखंड में जानलेवा हुई ठंड: चक्रधरपुर में पहले पत्नी, फिर पति ने छोड़ी दुनिया; प्लास्टिक के नीचे गुजार रहे थे रातें












