दिनेश गुप्ता
रमना (गढ़वा)। रोजगार की तलाश में रमना प्रखंड मुख्यालय सहित आसपास के ग्रामीण इलाकों से मजदूर पलायन करने को मजबूर हैं। रोजी-रोटी की तलाश में मजदूर दिल्ली, पंजाब, गुजरात, पुणे, महाराष्ट्र समेत अन्य महानगरों की ओर निकल रहे हैं। स्थिति यह है कि राज्य और केंद्र सरकार द्वारा संचालित मनरेगा सहित कई कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद पलायन पर लगाम नहीं लग पा रही है।
प्रशासन द्वारा पलायन रोकने के तमाम प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद रेलवे स्टेशन और अन्य स्थानों पर रोजाना मजदूरों को बाहर जाते देखा जा रहा है। पलायन कर रहे मजदूरों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि घर-परिवार का भरण-पोषण करने के लिए बाहर जाना उनकी मजबूरी बन गई है। उन्होंने कहा कि स्वयं सहायता समूह के कर्ज चुकाने के दबाव के कारण भी उन्हें दूसरे राज्यों में काम करने जाना पड़ रहा है।
मजदूरों ने बताया कि गांव में नियमित रूप से मजदूरी का काम नहीं मिल पाता है। मनरेगा योजना जरूर संचालित है, लेकिन इसमें भी साल भर लगातार रोजगार उपलब्ध नहीं हो पाता। वहीं बाहर के राज्यों के औद्योगिक क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अच्छी दैनिक मजदूरी मिल जाती है, जिससे परिवार का खर्च और कर्ज चुकाना आसान हो जाता है। ग्रामीणों ने कहा कि अकाल जैसी परिस्थितियों के कारण गांवों में काम मिलना और भी मुश्किल हो गया है, जबकि अन्य राज्यों में मजदूरी के अवसर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
मजदूरों का कहना है कि यदि जिले में फैक्ट्री या उद्योग स्थापित होते, तो उन्हें अपने घर-परिवार को छोड़कर बाहर जाने की नौबत नहीं आती। किसी तरह वाहन किराया की व्यवस्था कर वे कमाने के लिए पलायन कर रहे हैं। खासकर स्वयं सहायता समूह के कर्ज चुकाने का दबाव पलायन का बड़ा कारण बन रहा है। इसके चलते प्रखंड के विभिन्न गांवों से सैकड़ों मजदूर रोज बाहर जा रहे हैं और गांवों की रौनक धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है।
मजदूरों ने यह भी बताया कि बाहर काम करने के दौरान उनके साथ अक्सर दुर्घटनाएं और अन्य घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन मजबूरी के कारण वे जोखिम उठाने को विवश हैं। गरीब मजदूर अपने परिवार के पालन-पोषण और कर्ज चुकाने के लिए बड़े शहरों की ओर जाते हैं, जहां उनके साथ होने वाली घटनाओं की सुध लेने वाला कोई नहीं होता।
पलायन का मुद्दा हर चुनाव में उठता है। चुनावी सभाओं में प्रत्याशी इसे रोकने के बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही यह मुद्दा हाशिये पर चला जाता है। कई बार प्रत्याशियों को जनता के गुस्से का भी सामना करना पड़ता है, फिर भी चुनाव जीतने के बाद स्थिति जस की तस बनी रहती है। अब देखना यह है कि पलायन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए सरकार आगे क्या ठोस कदम उठाती है।
रमना: रोजगार के अभाव से हजारों लोग प्रवासी मजदूर बनने पर मजबूर, गांव के गांव हो रहे खाली













